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मध्य प्रदेश की पंचायतों में लटके ताले ,प्रदेश की 70 प्रतिशत जनता, मूलभूत सुविधाओं से भी मौहताज वातनुकूलित कमरे और डिजाइनर गद्दों पर एक टांग से खड़ी सरकार कर रही है योगा ड्रामा


 मध्य प्रदेश की पंचायतों में लटके ताले ,प्रदेश की 70 प्रतिशत जनता ,मूलभूत सुविधाओं से भी मौहताज

       वातनुकूलित कमरे और डिजाइनर गद्दों पर एक टांग से खड़ी सरकार कर रही है योगा ड्रामा

भोपाल। (पं.एस.के.भारद्वाज )मध्यप्रदेश की पंचायातों में इन दिनों अजीबो-गरीब हालात बने हुए है। एक ओर सरपंचों ने राज्य सरकार द्वारा अधिकारों में की गई कटौती को लेकर सरकार को ऊल्टीमेटम दे रखा है,कि यदि अधिकार बहाल नहीं किए गये तो ग्रामीण विकास एवं पंचायतराज मंत्री को सामूहिक स्तीफे सौपने की तैयारी में है। दूसरी तरफ सचिवों का दु:खड़ा कुछ और ही है। स्वराज्य न्यूज की टीम जब पंचायतों के हाल जानने पंचायतों में पहुंची, तब पंचायती राज की कई परते खुली। सचिवों का कहना है कि किसी भी मद की राशि जनपद एवं जिला मुख्यालय पर बैठे मुख्यकार्यपालन अधिकारी द्वारा तब तक जारी नही की जाती जब तककि 15 प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक अग्रिम राशि कमीशन में नही दे दें। ऐसे हालात में मजबूर सरपंच,सचिवों ने पंचापतों में ताला डालना ही उचित समझा और अधिकांश पंचायतों में ताले ही लटक रहे है। ग्रामीण जन अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिये इधर-उधर भटक रहे है। इस संबंध में स्थानीय विधायकों से चर्चा करने का प्रयास किया गया तो वे बात करने को ही तैयार नहीं हुए। जो वस्तुस्थिति स्वराज्य न्यूज की टीम ने मौके पर देखी आपको बतादें कि अधिकांश ये वे पंचायतें है जहॉ प्रदेश के मुख्यमंत्री का सीधा संबाद होता है तथा उनका गृह जिला है तथा राजधानी के नजदीक ग्राणीण क्षेत्र है जिसे आर.एस.एस. और भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है। यहॉ के युवा सांस्कृतिक आयोजनों के लिए प्रख्यात राजधानी निवासी एवं  सिंरौज जिला विदिशा के जन्मे एवं भाजपा के माननीय प्रवक्ता है। इन पंचायतों में सरपंच तो इतने दु:खी है कि अपनी नाक जनता के सामने बचाने के लिए अपनी स्वयं की धन राशि खर्च करके जनता के कार्य कार्य मजबूरीवश अतिआवश्यक कार्य करा रहे है। वे बडे दु:खी मन से कहते है कि हमारे पास 100/ रूपये भी जनहित के कार्य में खर्च करने का अधिकार नहीं है। पूरी पंचायती व्यवस्था की आर्थिक शक्तियॉ सरकार ने सरपंचों से छीनकर हमारे साथ अन्याय किया है । जनता ने हमें चुना है वो हमसे उम्मीद रखती है मगर हम सड़क पर पडे मृत पशु के शव को भी उठाने वाले को भी 200/रूपये नही दे सकते। दूसरी जल विद्युत मूलभूत सुविधाऐं मुहैया सत्कार सेवा कराना असंभव सा हो गया है । सभी विकास कार्य ठप पड़े है। ऐसे में कई सरपंच तो यहां तक कहते है कि जब सबकुछ सरकार मंत्री विधायकों को स्वयं ही करना था तो सरपंचों का चुनाव कराया ही क्यों?वहीे दूसरी ओर म०प्र० सरपंच उपसरपंच के संगठन के बैनर तले सरकार को जो 15 सूत्रीय ज्ञापन दिया गया है उसमें मुख्य रूप से आरटीजीएस व्यवस्था को यथावत रखने, महिला सरपंचो को कार्य सुविधा की दृिष्ट से अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार, पंचायतों को स्थापना व्यय के लिए नगर पंचायत, नगर निगम की तरह कम से कम 2 लाख रू से 5 लाख रू. तक राशि, नये कार्य से प्रतिबंध हटाने, पुराने काम के लिए राशि जारी करने, सरपंचों के रू,5000 मानदेय करने तथा सत्कार भत्ता दिये जाने, पंचायतों में नल-जल चालक, भृत्य के पद स्वीकृत करने, सरपंचों को ए.पी.एल. कार्ड बनाने, नामंान्तरण बटवारे का अधिकार, राजस्व विभाग को पंचायत विभाग से अलग करने, ग्राम पंचायतों एवं आरईएस के निर्माण कार्याे की सी एस आर रेट एक समान करने, विभिन्न प्रकार के ऑडिटो को समाप्त कर सिर्फ विभागीय अॅाडिट का प्रावधान करने तथा पंचायत सचिवों का वेतन कम से कम तृतीय श्रेणी का कर रू,20 हजार रूपये एव ंसहायक सचिवों का वेेतन कम से कम 10 हजार रूपये प्रतिमाह करने की मांग रखी है। देखना है कि मध्यप्रदेश के ये रीढ कहे जाने वाले सरकारी कार्यालय जो प्रदेश की लगभग 70 प्रतिशत आवादी को मूल भूत सुविधाऐं उपलब्ध कराते है कब तक खुलते है कब मुख्यमंत्री का सपना जीरो टालरेन्स का उद्घाटन होकर लागू होगा ये अभी सब भविष्य के गर्भ है छिपा है। वहीं आज की सरकार की वस्तुसिथति यह है कि वातनुकूलत कमरे और डिजाइनर गद्दों पर एक टांग से खड़ी सरकार को देख कर कोई भी हँसे बिना नहीं रह सकता.कम से कम मै तो नहीं,क्योंकि मुझे पता है कि योग प्रकृति से सीधे रिश्ते को मानता है .योग के नाम पर टोटके का कोई मतलब नहीं,योग एक जीवनशैली है ,इसे सरकारी स्टंट नहीं बनाया जाना चाहिए. योग के नाम पर सरकारी खजाने से पैसा पानी की तरह बहाना योग का भी अपमान है और उन योगियों का भी जिन्होंने इसे सदा राजनीति से दूर रखा ।  आज यह कहना कोई अतिश्योक्ति नही होगी कि प्रदेश की जनता पानी रोजगार शिक्षा के लिए गिड़गिड़ा रही है और सरकार एक टॉग पर खडी होकर उसी जनता जनार्दन की खून पसीने की कमाई पर अय्याशी में मदमस्त है।             





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