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मोदी की सौभाग्य योजना म.प्र. सरकार के उर्जा मंत्री व भ्रष्ट तंत्र से बनी दुर्भाग्यपूर्ण योजना


मोदी की  सौभाग्य योजना                          

 म.प्र. सरकार के उर्जा मंत्री व भ्रष्ट तंत्र से बनी

  दुर्भाग्यपूर्ण योजना 

 भोपाल। (पं.एस.के भारद्वाज)भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी  की विशेष फ्लैगशिप महत्वाकांक्षी देशव्यापी योजना  है।  योजना को प्रधान मंत्री सहज बिजली हर घर योजना के लक्ष्य के साथ  सौभाग्य योजना नाम दिया गया है। मगर दुर्भाग्य देखिए सरकारी कामकाजों में लेटलतीफी और घोटालों के चलते ठण्डे बस्ते में ही पड़ी है। इस योजना के लिए भारत सरकार ने हर राज्य के लिऐ एक बहुत बड़ी राशि को अंशदान के रूप में फंड प्रदान करने के लिए व्यवस्था की है । ,जिससे इस योजना का क्रियान्वयन सफल हो सके, तथा बिजजी से वे परिवार लाभावित हो सके जिन्हे दशकों से इन्तजार है, एक अदद बल्ब की रोशनी की झालक का। केन्द्र सरकार ने सौभाग्य योजना के तहत 45 लाख परिवारों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए इस योजना की घोषणा गतवर्ष सितंबर माह में की थी।   इस योजना के समयसीमा में पूरा करने के लिए  राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों को घर-घर बिजली उपलब्ध कराने के लिए प्रतिष्ठापन अर्थात इन्स्टॉलेशन का कार्य 31 दिसंबर 2018 तक लक्ष्य दिया है।  जिसके लिए हर राज्य ने उपकरण,सामग्री की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अधिकृत ठेकेदारों से निविदाऐं आमंत्रित की थी। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी इस योजना में मध्य प्रदेश सरकार तंत्र में एक कूटनीतिक भ्रष्टाचार सामने आया है। इस योजना के सफल और पारदर्शी क्रियान्वयन हेतु एम.पी.ई.बी.ने सीबीसी(सेन्ट्रल विजीलेंस कमेटी) के बनाये दिशा निर्देशों का पालन ही नहीं किया जिसे एम.विट्टल द्वारा सभी सरकारी निविददाओं के लिए तैयार किया गया था। और यह नियम खरीदी प्रक्रिया के लिए बन्धनकारी है। ं  मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियम तथा सेवा उपार्जन  नियम 2015 भोपाल दिनाक 28/07/2015 क्रमांक एफ6-14/2012/अ-ग्यारह जिसे मोहम्मद सुलेमान प्रमुख सचिव वाणिज्य,उद्योग और रोजगार विभाग म.प्र. शासन के हस्ताक्षर से जारी किया गया है। इसके नियम 25.2(निविदा में कोटेशन) के तहत स्थानीय उत्पादकों से उपकरण की खरीद के संबंन्ध में स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये गये थे। परन्तु दिशा निर्देर्शो और मापदण्डों के विरूद्ध क्रय प्रक्रिया अपनाये जाने से भ्रष्टाचार तो हो ही रहा है। लक्षित समय से योजना भी पिछड़ गई है। क्रय प्रक्रिया के विपरीत स्थानीय उत्पादकों को दर किनार करके मध्यप्रदेश के बाहर दूसरे राज्यों के उत्पादकों से उत्पाद क्रय करने के लिए आर्डर  दिये गये है।   इस योजना के तहत मध्य प्रदेश सरकार ने आवश्यक उपकरण खरीदने के लिए टेंडर तो जारी किये लेकिन इसे उच्च स्तरीय तंत्र साधकों ने अपने निजी हित- लाभ के कारण कूटरचित तरीके से नीतिगत प्रकिया का उल्लंघन करते हुए  अटकाया भी है। पीवीसी केबल के लिए टेंडर तो जारी किये मगर खरीदे ही नहीं । एबी केबल मांग का 60 प्रतिशत ही खरीदा गया जिसमें से मात्र 2 प्रतिशत हिस्सा ही राज्य की उत्पादन इकाईयों से खरीदा गया। आवश्यक डिस्ट्रीव्यूशन ट्रान्सफार्मर का लगभग आधा हिस्सा ही खरीदा गया और उसमें से मात्र 10 प्रतिशत की आपूर्ति राज्य की इकाईयों से करायी शेष 90 प्रतिशत अन्य दूसरे राज्यो के कराई गई। एएसस्ी कंडक्टर और एनर्जी मीटर की क्रय की भी यही स्थिति है। इन सभी सामग्रियों के लिए आवश्यक पूति एवं मात्रा निर्धारित की गई थी। मगर बाद में सभी का लगभग आधे से भी कम प्रतिशत इस योजना हेतु स्वीकृति दी गई ,इसमें जो भी स्वीकृति दी गई उसमें  से नाम मात्र के लिए स्थानीय उत्पादकों से क्रय किया गया और अधिकांश क्रय दूसरे राज्यों की इकाई  से क्रय किया गया है।  इस भ्रष्ट प्रक्रिया के लिए हम पाठको के लिए साक्षात प्रमाण के लिए कुछ आंकडे बताते है-भारत सरकार की महत्वाकांक्षी और खासकर मोदी की फ्लैगशिप योजना के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री  क्रय करनेे के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने अपने अधीन संचालित सभी  विद्युत कंपनियों को नोडल ऐजेन्सी बनाया है। जिसमें एक अनुमान के मुताबिक लगभग 950 से 1000 करोड़ के टेंडर जारी किये गये है। टेंडर जारी करना और कूटरचित तरीके से भारत सरकार के धन की राशि को अपने तरीके से ध्रुवीकृत करके,किस तरह भ्रष्टाचार किया गया है प्रदर्श आंकड़ो से स्पष्ट है । इसमें ऐसा प्रतीत हो रहा है मानों जैसे सरकार का ऐजेन्डा स्थानीय कारोबारियों को चौपट करना और सुखाधिकार प्रदाता सप्लायर या उत्पादक दूसरे राज्यों की कंपनीनियों को लाभ पहुचाना ही एक मात्र लक्ष्य है।  कुल खरीदी को प्रतिशत में देखें तो भी स्पष्ट है ऐसा लगता है जैसे जून माह की तपती दोपहर में अपने खुद के प्यासे बच्चे को एक ग्लास हल्का गरम पानी दे दिया हो, और फ्रिज में रखे ठंडे पानी से पडोसी के गमले सिंचित हो रहे हों। बच्चे के ठण्डा पानी नही मिलने से नाराज होने पर उसे परिजन डरा कर धमका कर अथवा पुचकार कर किसी भी तरह शान्त करा देते है।   भारत सरकार की महत्वाकांक्षी और खासकर मोदी की फ्लैगशिप योजना के लिए जिस प्रकार मध्यप्रदेश में उदाहरण देखने को मिला है इससे स्पष्ट है कि राज्य सरकार इस योजना की कुल लागत का जो राज्य सरकार को जो अंशदान देगी वह तो आज जनता से टैक्सरूपी कोल्हू मे पेर कर आम जनता से बसूल लेगी और भ्रष्ट अधिकारी और विद्युत कंपनियों  के संबंधित मुलाजिम कूटरचित अपनाई गई भ्रष्ट प्रक्रिया ये अपनी उदरपूर्ति कर भी लेंगे । यह भी संभव है विभागीय तानाशाह पहलवान मंत्री के मालिश के लिए चुनावी मल्लैयी साधन और पुत्री दामाद के लिए भी अंशदान के रूप में सरकारी दहेजरूपी योजना लाभ भी दक्षिणा मिल जायेगी। यह सभी संभव एवं निर्वाद, सरल प्रक्रिया है। खासकर मध्यप्रदेश सरकार में जिसका साक्षात प्रमाण भारत के भारत के नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक के आकड़ों में कभी भी देखा जा सकता है। और राजनीतिक ठसक का जलवा राज्य के माननीयों के सरकारी और गैर सरकारी बंगलों में लगने वाले दरवारों में । मगर दु:ख होता है उन छोटे-छोटे निर्माताओं और सीमित क्षमता और संसाधन वाले व्यवसायियों को देख कर , और चिन्ता भी होती है कि जब ऐसे लोगो ने सरकार की योजनाओं भरोसे , बैको से भारी भरकम कर्ज लेकर उत्पाद तो प्रारम्भ कर लिया और बाजार में भी आ गये। मगर सरकार के  भ्रष्ट पौलिसी मेकर  से स्थानीय लोगो का उद्योग विभाग का नियम होने के वाबजूद उत्पादन सरकार नही खरीदेगी।तो उनका भविष्य क्या होगा। क्या होगा उस भाषण का तो बड़े-बड़े मंचों पर खड़े होकर दिये जाते है कि मेरे भांजे और भांजियो तुम चिन्ता मत करना तुम्ही आने वाले समय के टाटा बिरला और अंबानी बनोगे। क्या ये छोटे उत्पादक व्यवसायी भविष में बड़े उद्योगपति बनेगे या घर परिवार का जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर बड़े कर्जदार बनके आत्महत्या के लिए प्रेरित होंगे। इस भ्रष्टाचार के कई कारण संभावित भी है। एक तो स्थानीय व्यापारी अथवा निर्माता मंत्री अथवा किसी वरिष्ठ अधिकारी को सीधे रिश्वत नही  दे सकता और किसी अधिकारी की स्थानीय होनें के नाते हिम्मत भी नही हो सकती ,कोई अधिकारी भी सीधे कुछ बोल भी नहीं सकता जबकि बाहरी व्यक्ति खुलकर सौदा कर सकता है। जैसा कि वर्तमान में प्रचलित सरकारी व्यवस्था में सर्वविदित है, क्योकि उसे स्थानीय का कोई भय नहीं है। रिश्वत की राशि का भुगतान भी वह देश के किसी भी कोने मे किसी सी स्वरूप में दे सकता है। स्थानीय के उत्पाद  की गुणवता और मात्रा का परीक्षण कोई भी स्थानीय स्तर पर कभी भी कर सकता है मगर वाहरी फर्म की जानकारी केवल संबंधित अधिकारी अथवा विभागीय मंत्री ही जानते है अर्थात आर्डर से कम सप्लाई का माल लेकर,ं ज्यादा माल का भुगतान करके भी सरकारी धन का गबन किया जा सकता है।  इसी प्रकार बहुत सारे कारण और तरीके सरकार के बैकपॉकेट में मिल जायेंगे जिसका आमजन के पास कोई तोड़ नही है। इस के संबंन्ध में जब सीधे प्रमुख सचिव उर्जा विभाग म.प्र. से उनके मंत्रालय में स्थित कार्यालय में संपर्क करने कां प्रयास किया तो उन्होंने  मिलने से ही मना कर दिया अपने निजी स्टाफ के माध्यम से बाद में आने का संदेश ही भिजवादिया। उसके बाद हमने श्री पौराणिक जी(जो विभागीय ऊर्जा मंत्री श्री पारस जैन के सहायक है व ,ऊर्जा विभाग के तकनीकी विशेषज्ञ बताये जाते है ) के माध्यम मे लिखित में प्रतिक्रया चाही तो उनकी लिखित में मिली प्रतिक्रिया भी हमारे समाचार को सत्यापित करती है। उन्होंने अपने जबाव में बताया है कि सौभग्य योजना के क्रियान्वयन के लिए सर्वें हमारा नहीं था वह तो भारत सरकार ने डाकघर विभाग से कराया था जिसमें लगभग 45 लाख घरों में बिजली पहुचाने का अनुमान दिया गया था। उसी सर्वे के अधार पर हमने सामिग्री खरीदी के लिए  टेंडर जारी किये थे। कार्य प्रारम्भ करने के बाद हमें ज्ञात हुआ कि अविद्युतीकूत घरों की संख्या 40 प्रतिशत कम है। जो लगभग 24 लाख तक है।  खरीदी में स्थानीय उत्पादकों के जबाव में बताया है कि विभाग ने स्थानीय उत्पादकों से खरीदी के लिए मात्र 10 प्रतिशत ही आरक्षित किया है। विभाग की मंशा है कि स्थानीय ही नहीं देश के सभी उत्पादकों  को अनुदानित राशि से क्रय प्रक्रिया में लाभ मिलना चाहिए। अब इसमें यक्ष प्रश्न यह है कि भारत सरकार ने पोस्ट ऑफिस के माध्यम से सर्वे कराया ,हितग्राहियों के ऑकड़े राज्य सरकार को दे दिये और राज्य सरकार ने बिना किसी सत्यापन अथवा अपने विभाग के सुरक्षित ऑकड़ों के मिलान करे ही कार्य भी प्रारंम्भ  कर दिया। कार्य प्रारम्भ करने के बाद कुछ बाद शिकायते मिलते ही विभाग प्रमुख के ऑकड़े पैदा हो जाते है जिसमें संख्या का अन्तर कोई सामान्य नहीं बल्कि लगभग दो गुणाा का अन्तर है। इससे स्पष्ट है यह सब पहले हो या बाद में ऑकड़ेबाजी में भी कोई बहुत बडा आर्थिक षडय़न्त्र हो सकता हैे। क्येाकि यहॉ जवाब किसी साधारण नागरिक अथवा विरोधी राजनेता का नहीं बल्कि सरकार की ओर से वरिष्ठतम भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी प्रमुख सचिव म.प्र.शासन श्री आईसीएस केसरी का है। यहॉ अयोग्यता अथवा अनभिज्ञता के विषय में तो प्रश्न ही किया जा सकता है।    इसी प्रकार ऊर्जामंत्री श्री पारस जैन से उनका पक्ष उनके सरकारी आवास पर जाकर जानना तो पहले तो काफी देर तक इधर उधर की बातें करते रहे, बाद में  कोई भी सकारत्मक जबाव देने के बजाय एक  जबाव दिया कि आपको जो छापना है खूब छापों हमारे प्रधान मंत्री श्री मोदी जी और मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का कोई तोड़ नही है चुनाव  में हम ही जीतेंगे   और  अगली बार भी सरकार भी हम ही बना रहे है। मेरे पास बहुत सारे बड़े-बड़े पत्रकार आते है, सबका काम मंगना खाना है। तुम्हारे छापने से कुछ भी फर्क नही पडऩे वाला । और यह कहते हुए सोफे से उठकर निवास के अन्दर चले गये । बाद में हम भी सरकार के दर्पण रूपी माननीय के चार इमली स्थित सुखभोगालय और जनता के लोकदर्शन स्थल से वापस आ गये।   

                       अपना देश,अपना प्रदेश, बना कर कानून लूटेंगे,काम करेगे हर विशेष । 

                        चिन्ता की कोई बात नही,तंत्र व्यवस्था ,मातृ रक्षा, विरोध जाये भाड़ में ।

                        भ्रष्टसखा मिल जनधन बांटेगें ,स्वर्णिम प्रान्त के मामा महाराजा है लंकेश ।।                             

                           मामा  है लंकेश मामा  है लंकेश मामा  है लंकेश मामा  है लंकेश.......।                            


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