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देश के प्रति बलिदान की याद दिलाता है गणतंत्र दिवस

 

26 जनवरी 1950 को देश में देश का अपना संविधान लागू हुआ था तब से इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाये जाने की शुरूआत हुई। 68 वर्षों में देश में देश का गणतंत्र कितना सफल रहा, इस पर लम्बी बहस की यहां तो गुजाइंश नहीं है पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि 'गणतंत्र' अपने उद्देश्यों में पूरी तरह सफल नहीं रहा। गणतंत्र को सफ ल व मजबूत बनाने में सबसे बड़े बाधक उसके अपने ही बनते रहे है। आपसी मतभेदों, टकराव के बजाय यदि विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका ने अपने-अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी, निष्ठा व समर्पण के साथ पालन किया होता तो निश्चित ही स्थिति कुछ और होती।
 
विधायिका, न्यायपालिका के बीच वैसे तो मतभेद व टकराव की अब तक अनेक घटनायें घट चुकी है पर प्रथम बड़ा टकराव 1974 में तब सामने आया था जब स्व. राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति स्व. जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था।
 
न्यायमूर्ति सिन्हा ने सारे दबाव को दरकिनार कर, सारे प्रलोभनों को ठुकराकर जिस साहस व दृढ़ता से अपना निर्णय तत्कालीन शक्तिशाली प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी के खिलाफ सुनाया था उससे भारत की निष्पक्ष न्यायपालिका की पूरी दुनिया कायल हो गई थी। नि:संदेह इस निर्णय से 'गणतंत्र का मस्तक' गर्व से ऊचा हो उठा था। पर किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि स्व. सिन्हा के उस ऐतिहासिक निर्णय का खामियाजा पूरे देश को आपातकाल के रूप में भुगतना पड़ेगा।
 
समय साक्षी है कि 26 जून 1974 को विधायिका व न्यायपालिका का टकराव चरम पर जा पहुंचा। 26 जून की आधी रात प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। नतीजतन नागरिकों की संविधान प्रदत्त आजादी पर अंकुश लग गया। अनुच्छेद 21, 22 को खत्म कर देने से किसी को भी हिरासत में लिया जा सकता था। 27 जून को प्रेस सेंसरशिप लागू करके अखबारों का गला घोट दिया गया।
 
विधायिका व न्यायपालिका के बीच दूसरा ऐतिहासिक टकराव 1974 में देश के सामने तब आया जब मध्य प्रदेश की तलाक से पीडि़त एक मुस्लिम महिला शाहबानों को गुजारा भत्ता दिये जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल 1975 को उसके पक्ष में निर्णय सुना दिया। उस पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम तुष्टीकरण की सारी हदें पार करते हुये मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 (तलाक पर अधिकार संरक्षण) पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ही पलट दिया था। यहां यह भी गौरतलब है कि अपनी ही सरकार के उक्त फै सले के विरोध में तत्कालीन गृहराज्य मंत्री आरिफ  मोहम्मद खान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
 
उपरोक्त दो ऐतिहासिक घटनाओं के अलावा कई अन्य अवसरों पर विधायिका व न्यायपालिका के बीच टकराव की घटनायें घट चुकी है। 1972 में केशवानंद भारती के मामले में सुप्रीम कोर्ट की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने साफ-साफ कहा था कि विधायिका सर्वोच्च नहीं है और वो कोई ऐसा बदलाव/संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मौलिक ढांचा प्रभावित होता हो। इनसे अंतत: गणतंत्र को ही नुकसान पहुंचा है। 
विधायिका व न्यायपालिका के बीच टकराव से आहत गणतंत्र की साख को न्यायपालिका के आपसी टकराव ने भी भारी क्षति पहुंचायी है।
 
1974 में जब इन्दिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू करके लोगो के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया था तो इसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई याचिका पर चार न्यायाधीशों ने जहां सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था वहीं न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना ने इनका विरोध किया था। कालांतर में उसकी उन्हे भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। वरिष्ठता के क्रम में शीर्ष पर होने के बावजूद उन्हे मुख्य न्यायधीश न बनाकर दूसरे स्थान पर रहे न्यायमूर्ति एमएच वेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया था। जिससे आहत होकर विरोध स्वरूप न्यायमूर्ति खन्ना ने पद से ही त्याग पत्र दे दिया था।
 
उसके बाद भी न्यायपालिका में आपसी मतभेद बंद नहीं हुये। अतीत की जाने भी दे तो बीती 12 जनवरी को जिस तरह चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने ही मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ पत्रकार वार्ता बुलाकर लोकतंत्र को ही खतरें में बता डाला था उससे हर कोई सकते में आ गया था। वहीं पूरा देश स्तब्भ रह गया था। यहीं नही उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी थी। अपने शानदार अतीत के लिये जानी जाने वाली भारतीय न्यायपालिका पर अनेक किन्तु परन्तु जैसे प्रश्न भी लगे थे।
 
विधायिका व न्यायपालिका के बीच बढ़ते टकराव का यह नतीजा कहा जायेगा कि आमलोगो में इन पर से विश्वास कम होना शुरू हो गया। न्यायपालिका के बढ़ते आपसी विवादों ने स्थिति को और गंभीर बना डाला। परिणामत: आये दिन न्यायपालिका के निर्णायों को चुनौतियां दी जाने लगी। कानून का मखौल उड़ाया जाने लगा।
 
जिस तरह फि ल्म निर्माता संजय भंसाली की फिल्म पद्मावत (पहले पद्मावती) को लेकर करणी सेना के लोग सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद न चलने देने की बार-बार घोषणायें ही नहीं कर रहे है वरन् जगह-जगह तोड़फोड़ करके सरकारी व निजी सम्पत्तियों को क्षति पहुंचा रहे है उनसे क्या यही अर्थ नहीं निकलता कि लोगों में सर्वोच्च अदालत के फैसलों के प्रति नफरमानी की कुछ ज्यादा ही हिम्मत आती जा रही है। इसके लिये क्या विधायी ताकतें ही जिम्मेदार नहीं है।
 
प्रश्न उठता है कि जब इस फि ल्म को संवैधानिक संस्था सेंसर बोर्ड ने दिखाने की अनुमति दे दी थी तो उसी समय से इस फिल्म को क्यों नहीं दिखाने दिया गया। माना की इसके विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया पर फिर जब सर्वोच्च न्यायालय ने भी हरी झंडी दे दी तो फिर किन्तु परन्तु के साथ फिल्म को न दिखाये जाने पर कुछ प्रदेश सरकारें ही क्यों अड़ी है। जबकि देश की सभी सरकारों को सर्वोच्च अदालत के आदेश का हर हाल में पालन करने, करवाने की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि सर्वोच्च अदालत के फैसलों का सड़क पर विरोध शुरू हो गया और सम्बन्धित सरकारें मूक दर्शक बनी रहे तो फिर देश के गणतंत्र का भगवान ही मालिक है।
 
हम सभी को ध्यान में रखना चाहिये कि यदि हमारा गणतंत्र मजबूत न रहा तो कालांतर में संवैधानिक अराजकता की आशका से इंकार भी कैसे किया जा सकता है। 
 
- शिवशरण त्रिपाठी

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