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मजबूरी में कोडनानी का समर्थन करने पहुंचे अमित शाह?

अहमदाबाद के कुछ हलक़ों में चुपचुप चर्चा हो रही है कि अदालत के हुक्म पर ही सही लेकिन अमित शाह अपनी पुरानी साथी माया कोडनानी के साथ खड़े हुए तो दिखे!

राजनीतिक विश्लेषक आरके मिश्र कहते हैं, 'कोडनानी तो काफ़ी वक़्त से अमित शाह को अपने बचाव में बुलाने की कोशिश कर रही थीं, कोर्ट में कहा भी था कि अमित शाह इस बात के चश्मदीद हैं कि वो उस दिन असेंबली और अस्पताल में मौजूद थे लेकिन बाद में वो कहने लगीं कि अमित शाह से उनकी मुलाक़ात नहीं हो पा रही. हालांकि अमित शाह तो अहमदाबाद आ ही रहे थे, तो कोर्ट ने हुक्म जारी करना पड़ा और उस हुक्म के बाद अमित शाह कोर्ट में हाज़िर हुए.'

शहर में बहुत सारे लोगों के 2002 दंगा मामलों में 'बचा' लिए जाने को लेकर भी चर्चा है. सरकारी वकील सुरेश शाह ने बीबीसी से कहा, "विशेष अदालत के सामने अमित शाह ने कहा कि गुजरात की पूर्व मंत्री 28 फ़रवरी, 2002 को उन्हें विधान सभा और सोला सिविल अस्पताल में दिखीं थीं."

मगर अमित शाह ने अदालत से ये कहा कि वो ये नहीं बता सकते हैं कि असेंबली से जाने और सोला अस्पताल पहुंचने के बीच में कोडनानी कहां गईं और वो किस समय अस्पताल पहुंची थीं. साथ ही ये भी कि अस्पताल से फ्री होने के बाद वो कहां गईं."

पीड़ितों के वकील शमशाद पठान ने कहा कि अमित शाह और कोडनानी के बयान अलग-अलग हैं - एक ने कहा कि वो अपनी गाड़ी में गईं दूसरा कह रहा कि उग्र भीड़ की वजह से पुलिस उन्हें लेकर गई.

मगर केस के मेरिट से अलग शहर में चर्चा ये भी हो रही है कि 2007 चुनावों के लिए टिकट बांटे जाते वक़्त माया कोडनानी नरेंद्र मोदी की लिस्ट में नहीं थीं और उन्हें टिकट दिलवाने के लिए एलके आडवाणी को दख़ल देना पड़ा था. वो बाद में मंत्री बनाई गईं.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार रतिन दास कहते हैं कि हो सकता है कि कोडनानी पहले मोदी के ख़ास ग्रुप में न रही हों 'लेकिन इस वक़्त की अनदेखी इसलिए है क्योंकि पार्टी के लिए अब वो उतने काम की नहीं रह गई हैं.'

रतिन दास कहते हैं, 'एक मामले में उनको उम्र क़ैद हो चुकी है, ये दूसरा मामला है जिसमें वो मुख्य अभियुक्त हैं. और कोडनानी ही क्यों ऐसे कितने ही लोग हैं जो दिन रात कहते रहते हैं कि दंगों के मामले में पार्टी उनकी मदद नहीं कर रही है ...'

कोडनानी को नरोदा पाटिया दंगा मामले में उम्र क़ैद हो चुकी है. और वो फिलहाल ज़मानत पर रिहा हैं. अमित शाह जिस मामले में गवाह के तौर पर पेश हुए हैं वो नरोदा गाम का है जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी.

लेकिन क्या पार्टी के लोगों की ऐसी अनदेखी का असर दिसंबर में होनेवाले चुनावों पर नहीं पड़ेगा? 'नहीं,' कहना है रतिन दास का.

लेकिन आरके मिश्र कुछ बातों की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं, "जिस तरह से प्रधानमंत्री बुलेट ट्रेन के उद्घाटन के फौरन बाद, दिल्ली पहुंचते ही फिर से वापस आते हैं नर्मदा के कार्यक्रम के लिए और जिस तरह से अमित शाह का दौरा गुजरात में बढ़ गया है उसका विश्लेषण आप कर सकते हैं."

"सोशल मीडिया पर बीजेपी विरोधी माहौल दिखाई दे रहा है - विकासपागलहोगयाहै, इसका ताज़ा उदाहरण है, और हाल में हुए पटेल और दूसरे आंदोलनों ने सूबे में बीजेपी की हालत पतली कर रखी है." मिश्र अपनी बातों की व्याख्या करते हैं.

नर्मदा आयोजन के लिए भी गुजरात सरकार ने तीनों पड़ोसी राज्यों राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश को न्योता भेजा गया था लेकिन वहां के मुख्यमंत्री नहीं आए. तीनों में बीजेपी की ही सरकार है.

 

 


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