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आगामी विधानसभा चुनाव में पसीना आ सकता है भाजपा को!

आगामी विधानसभा चुनाव में पसीना आ सकता है भाजपा को!

भोपाल । प्रदेश में में लगातार चौथी बार सरकार बनाने के सपने देख रही भाजपा के विधायक ही नहीं, मंत्रियों के लिए भी आगामी विधानसभा चुनाव आसान नहीं रहने वाला है। यह संकेत मिला है पिछले छह माह में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा संगठन और सरकार द्वारा कराई गई सर्वे रिपोर्ट्स में। सरकार की एक हालिया सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भाजपा की करीब 60 फीसदी सीटों पर हालत खराब है। यही कारण है कि संघ ने प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इयके साथ ही संगठन व सत्ता की ओर से विधायकों के साथ मंत्रियों को भी समय रहते हालात काबू में करने की हिदायतें दी जा रही हैं। उधर, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-सपा गठबंधन ने भाजपा की हवाइयां उड़ा दी है। अगर मध्य प्रदेश में भी गठबंधन होता है तो यह भाजपा के लिए भारी पड़ेगा।
  इतिहास गवाह है कि राजशाही हो या राजनीति चौथी पीढ़ी और चौथी पारी दोनों के पतन का कारण बनती है। कहा जाता है कि विजेता तैमूर लंग ने मशहूर इतिहासकार और समाजशास्त्री इब्न खुल्दुन से अपने वंश की किस्मत पर बात की। खुल्दुन ने कहा कि किसी वंश की ख्याति चार पुश्तों से ज्यादा शायद ही टिकती है। पहली पीढ़ी जीत पर ध्यान केंद्रित करती है। दूसरी पीढ़ी प्रशासन पर। तीसरी पीढ़ी, जो विजय अभियानों या प्रशासनिक जरूरतों से मुक्त होती है, उसके पास अपने पूर्वजों के जमा धन को सांस्कृतिक कार्यों पर खर्च करने के सिवा कोई काम नहीं रह जाता। अंततः चौथी पीढ़ी तक वह एक ऐसा वंश रह जाता है जिसने अपना सारा पैसा और उसके साथ ही इंसानी ऊर्जा भी खर्च कर दी है। यह प्राकृतिक अवधारणा है और इससे बचा नहीं जा सकता। तो क्या यही प्राकृतिक
अवधारणा भाजपा को चौथी पारी में बाधा बनेगी? 

140 सीटों के लिए नए चेहरों की तलाश
उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भाजपा के पास 165 विधायक हैं। यानी 230 विधानसभा क्षेत्र वाले मप्र में भाजपा पहले से ही 65 सीटों पर कमजोर है। इनमें से वर्तमान समय में कांग्रेस 56, बसपा 4, निर्दलीय तीन सीटों पर काबिज है, जबकि दो खाली हैं। सरकार की वर्तमान रिपोर्ट में 66 सीटों (8 मंत्रियों और 58 विधायकों) पर जनाधार कमजोर हुआ है। अनुमानित तौर पर यह आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है। भाजपा के सूत्रों की माने तो यह संख्या 75 तक पहुंच सकती है। इस तरह कम से कम आगामी चुनाव में भाजपा को 140 सीटों (60 फीसदी) पर नए चेहरे उतारने पड़ सकते हैं। यह इतना आसान नहीं होगा। खासकर पुराने चेहरों और विधायकों की चुनौती को भी खारिज नहीं किया जा सकता।


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