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जिसका कोई नहीं होता,उसका बाहुबली होता है

जिसका कोई नहीं होता उसका बाहुबली होता है


चुनाव का मौसम हो और बाहुबली-जात- धर्म-संप्रदाय पर चर्चा न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है।
अखबार हो या नैशनल न्यूज चौनल, न्यूज ऐंकर हो या वरिष्ठ पत्रकार, बुद्धिजीवी हो या
राजनीतिक विश्लेषक, सब गरमा-गरम बहस करते हैं। मजे की बात यह होती है कि किसी भी
बहस में किसी को यह बात समझ में आती ही नहीं है कि लोग देशभर में बाहुबली को वोट क्यों
देते हैं? बाहुबली चुनाव क्यों जीत जाते हैं?
दरअसल मीडिया और मीडिया पोषित बुद्धिजीवियों का नजरिया एकांगी होता है। वे पूर्वग्रहों से
मुक्त होकर लोगों की सोच तक पहुंच नहीं पाते हैं। लोग बाहुबली में क्या देखते हैं? और
बुद्धिजीवी क्या देखते हैं? दोनों के देखने में फर्क होता है। ऐसा नहीं है कि जो बुद्धिजीवी जिन
बुराइयों को बाहुबलियों में देखते हैं और मीडिया जिन केस, मुकदमों और दफाओं के जरिये जनता
तक बाहुबलियों की सच्चाई पहुंचाने का प्रयास करता है, जनता भी उन सच्चइयों को भली-भांति
जानती है। मगर बुद्धिजीवियों और मीडिया की नजर उधर नहीं जाती है और अगर चली भी
गई, तो वे उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं और अपने फिक्स फ्रेम, में बैठकर बहस
करते हैं। जबकि जनता का कोई फिक्स फ्रेम नहीं होता हैं।
जनता देखती है कि किसी भी बाहुबली का हर व्यक्ति की तरह सिर्फ एक ही आयाम नहीं होता
है। वह बहुआयामी होता है। वह पाप अपने लिए करता है और पुण्य दूसरे के लिए। यही उसे
रॉबिनहुड बना देता है। हम अपने सिनेमा और साहित्य को देखें,तो इस बात को कोई बुरा नहीं
मानता है कि किसी के साथ अन्याय हुआ और उसने उसका बदला लिया। सामाजिक सोच में
बदला लेना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती है। यहां पर एक बात और ध्यान देने की है कि
हमारी व्यवस्था में अगर लोगों को न्याय मिले, तो वे क्यों बाहुबली के पास जाएंगे? न्यायालय
और न्यायाधीश न्याय नहीं देते, पुलिस सुरक्षा नहीं देती, ब्यूरोक्रेट्स सरकारी योजनाओं का लाभ
जनता तक नहीं पहुंचने देते और मीडिया सही मुद्दे नहीं उठाती। नतीजा यह होता है कि निरीह
और निराश जनता की आस है- बाहुबली। लोगों को लगता हैं कि हमारे हित और लाभ की लड़ाई
वही लड़ सकते हैं। यही तो हमारा साहित्य और सिनेमा रोज दिखाता है। आश्चर्य की बात है कि
इस आसान सी बात को विद्वान क्यों नहीं समझते?
इन सच्चाइयों को सामने रखें, तो समझ में यह बात आसानी से आती है कि लोग बाहुबली को
वोट क्यों देते हैं? बाहुबली वर्क डिलिवर करता है। बाहुबली के अलावा कौन बुद्धिजीवी या
विश्लेषक या भला आदमी या नेता लोगों को क्या देता है? पिछले 70 साल का लेखा-जोखा देखें,
तो भले आदमी की वकालत करनेवालों को समझ में यह बात आ जाएगी कि लोगों को उन्होंने
क्या दिया है। जो भी लोग कुछ पाने की आस रखते हैं, वे या तो बाहुबली के पास जाते हैं या
फिर उनके पास जो उनकी जाति के होते हैं या उनके धर्म और संप्रदाय के होते हैं। इसलिए लोग
जाति-धर्म, संप्रदाय के आधार पर वोट करते हैं। बाकी से तो जनता हताश और निराश है।


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