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भाजपाः नंबर एक नहीं बल्कि नंबर तीन?

  भाजपाः नंबर एक  नहीं बल्कि नंबर तीन?

 

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सर्व हिंदू वोट मिले थे। 42 प्रतिशत वोट से तब उसकी विधानसभा की 333 सीटों पर बढ़त थी। उस माहौल की झलक आज नरेंद्र मोदी, अमित शाह को यदि मिली होती तो प्रधानमंत्री के मुंह से वह सब नहीं निकलता जो चुनाव सभाओं में निकला है। तभी लाख टके का सवाल है कि ढाई सालों में यूपी में मोदी की हवा कितनी उतरी? आम तौर पर लोकसभा के साल बाद जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं उसमें औसतन दस प्रतिशत वोट घटा है। विधानसभा के हर चुनाव में लोकसभा के मुकाबले भाजपा को नौ- दस प्रतिशत कम वोट मिले हैं।

यह भी ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश में 2002 से ले कर 2012 तक के पांच चुनावों में भाजपा कोई बीस प्रतिशत औसत वोटों की पार्टी थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे सिर्फ 15 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन दो साल बाद के लोकसभा चुनाव में ये 42 प्रतिशत वोट हुए। इसका अर्थ है कि उसकी तरफ 2014 में 22 प्रतिशत फ्लोटिंग वोट गए। ठीक विपरीत 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी दशा के बावजूद समाजवादी पार्टी को 22 व कांग्रेस को 7.5 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं बसपा के 20 प्रतिशत वोट थे।

इस बैकग्राउंड, इन आंकड़ों पर अपनी थीसिस है कि सपा-कांग्रेस एलायंस 29.5 प्रतिशत वोट, बसपा 20 प्रतिशत कोर वोट के साथ इस चुनाव मैदान में है। वहीं भाजपा 20 प्रतिशत उस कोर वोट (ब्राह्मण-बनिया, फारवर्ड सहित कुछ अति पिछडे) से मैदान में है जो हमेशा उसे मिलता रहा। वह बिना मोदी, बिना अमित शाह के भी भाजपा का चट्टानी है। सो, झगड़ा थाली पर इधर से उधर लुढकते मतदाताओं याकि फ्लोटिंग वोटों का है। 2014 में मोदी की आंधी का रिकार्ड वोट, जहां 42 प्रतिशत था वहीं उससे पहले राम मंदिर की आंधी के वक्त भाजपा का रिकार्ड वोट 1991 व 1993 में क्रमशः 31 व 33 प्रतिशत था।

सो, अपना मानना है कि भाजपा यदि 32 से 35 प्रतिशत वोट पाती है तो वह यूपी में सीधे नंबर एक पार्टी होगी। 2014 के 42 प्रतिशत नहीं बल्कि उसे 33 से 35 प्रतिशत वोट भी मिल जाएं तो वह विधानसभा में अपने को नंबर एक बना सकती है।

हिसाब से यह हिंदू हवा में आसान है लेकिन चुनाव हिंदू हवा में नहीं, बल्कि जात-पांत की गणित पर बना हुआ है इसलिए गड़बड़ है। जैसे मैंने पहले भी लिखा है कि जात-पात की सोशल इंजीनियरिंग हमेशा राष्ट्रीय पार्टियों याकि कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ जाती है। जात-पात की राजनीति में फायदा क्षत्रपों और जातिवादी नेताओं का होता है। जात-पात का हिसाब छोटी पार्टियों के लिए पॉजिटिव और सीधी शुरुआत लिए होता है जबकि भाजपा के लिए मुकाबला उलटी गिनती से शुरू होता है। यह बात गंभीर और पेचीदा है। इसे उत्तर प्रदेश के उदाहरण से समझा जाना चाहिए। जात-पात की राजनीति पर चुनाव को तौलते हुए पहले यह सोचना होगा कि भाजपा के खिलाफ यूपी में कोर वोट कौन सा है?

तो जरा हिसाब लगाए। नंबर एक वोट बैंक मुसलमानों का है। कोई 19 प्रतिशत मुसलमान। माना जाए कि ये भाजपा को नहीं मिलेंगे। फिर 21 प्रतिशत दलित। नंबर तीन पर नौ प्रतिशत यादव। ये कुल हुए 49 प्रतिशत वोट।

सोचें इन 49 प्रतिशत की तासीर में क्या आज नरेंद्र मोदी के प्रति कोई अनुराग है? कहने को भाजपा में हिसाब है कि दलित में गैर-जाटव याकि खटीक, पासी, वाल्मिकी आदि मायावती को वोट नहीं देंगे और वे भाजपा को मिलेंगे। मायावती की दलित सत्ता के बजाय ये भगवा सरकार चाहेंगे! इन 49 प्रतिशत में भाजपा की एक गणित यह भी है कि मुसलमान वोट सपा व बसपा में बंटेंगे। इसलिए भाजपा के मजे हैं।अब क्या कहा जाए! उम्मीद पर दुनिया टिकी है!

बहरहाल, ऊपर के तीन समूहों के ठोस 49 प्रतिशत को अलग कर बाकि 51 प्रतिशत मतदाताओं को जातियों में बांट कर आगे विचार करें कि इनमें किनकादृक्या रूझान है? इसमें 19 प्रतिशत फारवर्ड वोट (ब्राह्मण, राजपूत, बनिया) होने का आंकड़ा है। इसमें दो प्रतिशत जाटों को भी जोड़ देना चाहिए। मतलब कुल 21 प्रतिशत का यह वह वोट बैंक है, जो सियासी तौर पर जागरूक, हल्ला बोल वाला है। ये दमखम से अपना वोट डालते हैं तो गांव-बस्तियों में वोट डालने-डलवाने का माहौल भी बनाते हैं। ब्राह्मण, बनिए और जाट ने 2014 में झंडा उठा कर हर, हर मोदी का हल्ला बनवाया था।

क्या मेरठ में या बनारस में आज वैसा हल्ला ये बनवाए हुए हैं? जाहिर है ये वोट उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण आदि में बंटेंगे। अब बचते हैं कोई 30 प्रतिशत वोट। इसमें एक प्रतिशत जनजाति-ईसाई बताए जाते हैं तो 28-29 प्रतिशत को गैर-यादव पिछ़ड़ों और अति पिछड़ी जातियों के समूह में बांध सकते हैं। मतलब तीन प्रतिशत कुर्मी, 2-2 प्रतिशत लोध, मल्लाह, गड़रिया, तेली, डेढ़-डेढ़ प्रतिशत कुम्हार, कहार, काच्छी, नाई और एक प्रतिशत गुर्जर की यह गणित प्रदेश में छोटे-छोटे समूह में बिखरी और फैली हुई है। जाहिर है हिंदुओं को बांट कर जातियों का माइक्रो प्रबंधन का यह एक ऐसा कोर आंकड़ा है, जो अपना मानना है कि कहीं भी किसी भी सूरत में वैसे 70 या 80 या 90 या सौ फीसदी तक वोट नहीं डालता है, जैसे मुसलमान डालता है या फिर अपनी सत्ता की शिद्दत में दलित, ब्राह्मण व राजपूत डाल सकता है।

यों, पिछड़ी जातियों के इस सूमह को ही सत्ता का भरोसा दिलाते हुए नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर केशव प्रसाद मोर्य को बैठाया है। मगर इससे हिंदुओं के दूसरे समूह याकि ब्राह्मण, राजपूत, बनिए, जाट आदि में जो मनोदशा बनती है वह भी कम जोखिम वाली नहीं है।

संदेह नहीं कि हिंदू वोटों में जात को बांटते-बांटते अमित शाह ने भाजपा रणनीति में 29 प्रतिशत गैर-यादव पिछड़ों-अति पिछड़ों की संख्या पर निर्भरता बनवाई है। इसी हिसाब में उन्होंने छोटी-छोटी जातियों के नेताओं को बसपा या सपा से तोड़ कर उम्मीदवार बनाया। कुर्मियों की अपना दल और राजभर की पार्टी से एलायंस किया। कुछ वैसे ही जैसे बिहार में महादलित और अति पिछड़ों का हिसाब बना एलायंस किया था। जीतनराम मांझी से ले कर उपेंद्र कुशवाह सबको दौड़ाया। पर यूपी में जातियों की इन पार्टियों के टुकड़े भी चुनाव लड़ रहे हैं जैसे यूपी में निषाद पार्टी भी वोट काटने वाली है तो अपना दल की अनुप्रिया का विरोध उनकी मां की पार्टी कर रही है।

इसके बड़ा सवाल यह है कि जातियों का यह फैक्टर जब चुनाव में काम कर रहा है तो 2017 का मौजूदा चुनाव अपने आपमें सामान्य रूटीन किस्म का बना है। इसमें वह सत्व-सत्व और तासीर नहीं है, जो 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त थी।

जाहिर है भाजपा की एक नंबर बनने की दावेदारी मुसलमान, दलित, यादव, जाट के 51 प्रतिशत वोटों को दरकिनार करते हुए सोची जानी चाहिए। भाजपा 49 प्रतिशत वोटों में से अपनी आंधी आती देख रही है। यह भी ध्यान रहे कि इन 49 प्रतिशत में बसपा और सपा, कांग्रेस के दबंग ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कुर्मी आदि जातियों के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हैं। यानी तीनों तरफ से 49 प्रतिशत वोटों को ले कर खींचतान जबरदस्त है।

एक हिसाब से मुसलमान व दलित का जोड़ जहां बसपा के सीधे 39 प्रतिशत वोट बनवाता है तो वैसा ही ठोस लांच आधार कांग्रेस-सपा के एलायंस का भी है। अखिलेश के 2014 में मोदी की आंधी में भी सपा को मिले 22 प्रतिशत, कांग्रेस को मिले 7.5 प्रतिशत वोट का बेसिक जोड़ 29.5 प्रतिशत है। यदि मुसलमान की सीट वार टेक्टिकल वोटिंग हुई तब भी सपा-कांग्रेस एलायंस बनाम बसपा की लड़ाई नंबर एक और दो की बनती है। तभी यह कोर सवाल है कि जात-पांत के जब ऐसे आंकड़े हैं तो दो जातीय पार्टियों के अंगने में भाजपा भला कहां टिकती है?

बावजूद इसके भाजपा का हल्ला नंबर एक होने का है। इसके पीछे दलील है कि मुसलमान बंट रहे हैं। बेटे के पिता के प्रति व्यवहार से यादव नाराज होकर भाजपा में जा रहे है। गैर जाटव दलित मायावती को छोड़ कर भाजपा के साथ हैं। फारवर्ड व बैकवर्ड वैसे ही मोदी, मोदी के असर में हैं, जैसे 2014 में थे। सोचे, क्या ऐसी ही गणित व केमिस्ट्री भाजपा ने बिहार में नहीं सोची थी?

                                                                                                                                                                          (हरि शंकर व्यास)

 



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