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निस्तारी भूमियों पर लठैतों का कब्जा


               निस्तारी भूमियों पर लठैतों का कब्जा 

 भोपाल। (पं.एस.के.भारद्वाज)मध्यप्रदेश मे सार्वजनिक कार्यों के लिए आरक्षित भूमियों की जमकर बंदरबांट की गई है। सार्वजनिक आम रास्ता, शमशान के लिए आरक्षित भूमि तालाब तथा पोखरों जैसे सार्वजनिक उपयोग में आने वाली जमीनों को स्थानीय दबंगो ने राजस्व अधिकारियों/कर्मचारियों और प्रभारी मंत्रियों से सांठ-गांठ कर निजी स्वामित्व की भूमि राजस्व रिकार्डों मे दर्ज कराकर अपनी दबंगई को साबित कर दिया है। पटवारी और राजस्व निरीक्षक, तहसीलदारों की मिलीभगत से इस काम को बखूबी अंजाम दिया गया है। जो कमी तालाब, पोखर व श्मशान हेतु सार्वजनिक प्रयोजन की भूमि थी वह आज निजी स्वामित्त्व की भूमि हो गई है। यह स्पष्ट नही हो पा रही है कि यह कार्य शासन प्रदेश से हुआ है या कुछ चंद राजस्व अधिकारियों द्वारा किये गये भ्रष्टाचार का प्रमाण है।

    आज ग्रामीण क्षेत्रों मे पूर्व में आरक्षित आम रास्तों का अता-पता नहीं है हजारों एकड़ पर से श्मशान भूमि तथा तालाब-पोखर नदाहद है वे खेती-काश्तकारी की जमींन का रूप ले चुके है यह कैसे संभव हुआ इसकी विस्तृत जांच कराये जाने की आवश्यकता है तथा जिन दबंगों ने राजस्व अधिकारियों से मिलीभगम कर रिकॉर्ड मे हेराफेरी कराकर सार्वजनिक सम्पत्तियों को अपने निजी हित के प्रयोजन मे लिया है उन पर कठोर कार्रवाही किये जाने की आवश्यकता तथा सार्वजनिक उपयोग की भूमिको दबंगों के चंगुल से मुक्त कराकर पुन: सार्वजनिक प्रयोजन कि उपयोग के लिये आरक्षित कर देना चाहिए। इस प्रतिनिधि को प्रदेश के कई जिलों से इस तरह की शिकायतें मिली है। शिकायतों मे यह भी कहा गया है कि स्थानीय जिला प्रशासन से इस सिलसिले में कई बार निवेदन किया गया पर किसी के कान में जूं तक नही रेंगती।         

       ग्रामीण परिवेश में पैदा हुए, और शहरी परिवेश में पले बढ़े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस व्यवथा से भलीभाँति परिचित है कि किस तरह की मनमानी निजी स्वार्थ की खातिर की जाती है। उनसे उम्मीद की जाना चाहिये कि पूर्व की समस्त सार्वजनिक उपयोग की जमीनों को कब्जा मुक्त कराकर सार्वजनिक उपयोग के लिये समर्पित करने में कोई कसर नही छोड़ेंगे। पूरे राज्य की ऐसी सार्वजनिक उपयोग की जमीनो जानकारी जो कि पूर्व में थी एकत्रित कराकर कब्जाधारियों को कब्जे से मुक्त कराने की पहल करेंगे ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में आम रास्ते, श्मशान आदि को लेकर हो रहे विवाद समाप्त किये जा सके। वही तालाबों पोखरों के मुक्त होने से पशुओं, पक्षियों एवं जानवरों को पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चितहो सके। यहां यह बताना सामयिक होगा कि मध्यप्रदेश मे कोई भी ऐसा गांव नही है जहां सार्वजनिक उपयोग के एक-दो तालाब न हो। पूर्व में ग्रामीण अंचल के जमींदार इनका निर्माण इस उद्देश्य से कराते थे कि ये सब के उपयोग में आयेंगे, जिसका पुण्य उन्हें मिल सकेगा तथा लम्बे समय तक इसके माध्यम से उनके नाम को याद रखेंगे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से उम्मीद की जाना चाहिये कि वे इस तरफ सकारात्मक पहल करते हुए प्रचीन संस्कार को बचाने पहल अवश्य करेंगें।


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