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15 अगस्त 2015 स्वत्रंता दिवस के अवसर पर श्री अशोक मनवानी के विशेष आलेख पर मेरी टिप्पणी

     15 अगस्त 2015 स्वत्रंता दिवस के अवसर पर श्री अशोक मनवानी के विशेष आलेख पर  मेरी टिप्पणी

भोपाल (पं.एस.के.भारद्वाज)मध्यमप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं आयुष को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन  इसमें शंका है ,अपने चाटूकारों के आगे, अपने आधीनस्थ दलाल रूपी सरकारी कर्मचारियों के आगे,। यहॉ अतिश्योक्ति तब और हो जाती है जब यहॉ ऐसे व्यक्तियों अथवा संस्थानों को सम्मानित कर दिया जाता है जो उसके योग्य ही नहीं होते हैं जूरी द्वारा अनुशंसित पात्र कितने योग्य होते है कहीं कोई चयन में पारदर्शिता नहीं होती हैं। आलेख में प्रकाशित जानकारी अनुसार आयुष स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का आयुष के प्रति लगाव सराहनीय है। इनके छत्र-छाया में आधुनिक प्रयोगशालायों सहित अन्य सुविधाएँ विकसित हो रहीं हैं अर्थात अभी तक आयुष विभाग बिना आधुनिक प्रयोगशालायों के चल रहा था, राम भरोसे शायद इसी कारण आयुर्वेद सिद्धा रसातल गमन की ओर था। चलो देर आये दुरूस्त आये कम से कम प्रयोगशालाओं का तोहफा तो लेकर आये मगर ये तो बतायें कि उन प्रयोगशालाओं में क्या रिसर्च होगा? क्योंकि रिसर्च की पराकाष्ठा का पार किये हुए पाश्चात्य चिकित्सक इन्हीं आयुर्वेद की नकल मारते हैं। क्योंकि हर साध्य कष्ट साध्य, असाध्य पर ऋषिमुनी प्रयोग कर चुके हैं और पाश्चात्यों द्वारा उन्हीं प्रयोगों को नकल मारकर नया रूप दिया जाता रहा है और आज भी जोर शोर से हो रहा है। आज देखना तो ये है कि ऋषियों की रिसर्च के आगे कौन नया ऋषि पैदा हो गया है? समस्यायें  तो बहुत सारी हैं हम मात्र एक समस्या पर चर्चा करते हैं जिसे मुनियों ने प्रमेह और मधुमेह कहा है, प्रमेह साध्य कष्ट साध्य है व मधुमेह असाध्य की श्रेणी में ऋषियों द्वारा रखा गया है। इसे भगवान भारद्वाज ने सतयुग में ही दो भागों में विभक्त किया था, ''प्रमेहौ दौ भवतौ, सहजौ पथ्य निमित्तश्चÓÓ, इसी की नकल मारकर पाश्चात कहते हैं शुगर दो प्रकार की होती हैं इन्सीपीडस व नॉन इन्सीपीडस। अब भारतीयता के साथ चलने के बजाय विदेशी भाषा-शैली के साथ चलने वाले आयुष चिकित्सक प्रमेह को प्रमेह न कह कर शुगर कहने लगे और और हद से ज्यादा बात यह होगयी कि इस रोग से चिकित्सक स्वयं पीडि़त होने लगे और इनसे यदि पूछा जाये ये शुगर क्या है? तो बखान भी कर लेते हैं कि कभी न अच्छा होने वाला रोग है क्या इनका शास्त्र यह कहता है कि ये रोग कभी नहीं ठीक होता? अथवा सरकार बोलने नहीं देना चाहती कि ये रोग पूर्णत:ठीक होता है,जबकि चरक शास्त्र के मुताबित कफज प्रमेह साध्य है, पित्तज प्रमेह कष्ट साध्य है, वातज त्रिदोषज की श्रेणी में जाकर असाध्य है जिसे कि मात्र नाड़ी परीक्षण से ज्ञात किया जा सकता है,  कितने आयुष के चिकित्सक बन्धन मुक्त मन से यह बोल सकते हैं? क्या ये  नरोत्तम मिश्रा अर्थात ऐश्वर्या राय के नाम से विधान सभा में विख्यात सरकार के प्रभावशाली मंत्री का विभाग बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लालच को तजकर अपने अधीन जिम्मेदारों को खुलकर बोलने की आजादी दे सकता है? या भाजपानीत शिवराज सिंह चौहान की सरकार आयुष चिकित्सकों को यह अधिकार दे  सकती है? अधिकार विहीन आयुष चिकित्सक इन प्रयोगशालाओं में कौन सा इतिहास रचने वाले हैं? आयुष चिकित्सक तो प्रयोगशाला से अधिक पाश्चात  गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं देशवासियों की देश की औघधियों और पद्धति से उपचार करना चाहते है। लेकिन क्या सरकार स्वयं आई.एम. ए. (इंडियन मेडीकल एसोसिएशन)के हाथ की कठपुतली नहीं है? क्या सरकार आयुष के प्रति वाकाई संवेदनशील है? क्या मानसिक स्वास्थ्य आयुष चिकित्सक मध्यप्रदेश में पैदा हो रहे हैं? या भाजपा के राज में आयुष गुलाम पैदा किये जा रहे हैं। अगर हम यूनानी चिकित्सा पद्धति की ओर देखते तो लगता है दो प्रतिशत को छोड़कर पूरी यूनानी चिकित्सा दिग्भ्रमित है। यूनानी चिकित्सा रसातल की ओर गमन कर चुकी है। जहां-जहां सरकार के यूनानी चिकित्सालय हैं वहां-वहां मुरब्बा, चटनी का ऐसा अभाव हैकि आप ढूॅडते रह जाओगे,जबकि मुरब्बा, चटनियों पर ही यूनानी चिकित्सा पद्धति आधारित है क्या कारण है कि यूनानी चिकित्सा राजाश्रय विहीन है? अर्थात न सरकार का संरक्षण न उपचार हेतु आर्थिक सहयोग, क्या कारण है यूनानी चिकित्सा पद्धति पर रोने वाले किराये पर भी नहीं मिलते? क्या हम ये नहीं कह सकते कि सरासर मध्यप्रदेश सरकार यूनानी चिकित्सा पद्धति की हत्यारी है? इसका दोषी कौन? शिवराज सिंह चौहान या नरोत्तम मिश्रा या फिर इनके अधीनस्थ सरकारी तंत्र या फिर स्वयं यूनानी चिकित्सक सरकार की ढपली की तान में मस्त होकर अपनी ही पैथी के कुठाराघात  कर भष्मासुर बने हुए हैं। यदि मान भी लें प्रदेश सरकार स्वस्थ मन से आयुष को पोषित करना चाहती है,आयुष को राजश्रय में देेना चाहती है गुलामी मुक्त करना चाहती है तो आयुष चिकित्सकों को खुलकर बोलने की आजादी दे क्योंकि हमारे चिकित्सक खुलकर ये नहीं बोल सकते कि प्रमेह साध्य है जिसे पाश्चातय इन्सीपीडस कहते हैं और जनता को दिग्भ्रमित कर प्रतिदिन शुगरकी करोड़ों रूपये की गोलियों का कारोबार किया जा रहा है। इस देश के नागरिकों को सुनियोजित तरीके से  इन गोलियों के द्वारा किडनी रोगी बनाया जा रहा है।  डायलिसिस करने वाली मशीनों का भी विश्वव्यापी व्यवसाय दलाली प्रथा के दम पर खूब फल-फूल रहा है। आयुष चिकित्सकों को प्रयोगशालाओं से या दिखावे से अधिक जरूरी है स्वस्थ्य और गुलामी मुक्त मन से कार्य करने की आजादी देना, विभाग में ऐसे निपुण चिकित्सकों को नियुक्त करना जो प्रमेह को प्रमेह कहेें शुगर नहीं। उन्हें अपने शास्त्रार्थ पूर्ण शास्त्रों द्वारा कार्य करने की शिक्षा एवं साधना से स्वस्थ्य बनाना, उन्हें अपनी विधा में अपने शास्त्र वचन बोलने देने की आजादी की आवश्यकता है। पूरी दुनियां जानती है हिन्दुस्तानी आयुष चिकित्सक अपने-आप में चलती फिरती प्रयोगशाला है जो कि शुगर को साध्य कहते हैं 20 वर्ष पुराने (माईग्रेन) आधा सरदर्द को दो कोपल आक उर्फ अकउया गुड़ के साथ देकर, नाक में देशी घी डालकर मात्र तीन दिन में ठीक करने की क्षमता रखते हैं, निश्चित ही ये कैसा करतें हैं ये जानने की आवश्यकता इन प्रयोगशाला में है,जो कि सरकार का सराहनीय कार्य माना जाता है लेकिन क्या उस सरकारी कार्य को अंजाम देने के लिए सरकार के पास आयुर्वेद के ज्ञाता हैं।? पूरा प्रदेश जानता है आयुष में चिकित्सक बहुत कम आयुष गुलाम ज्यादा हैं जो निजी नर्सिंग होमों में आई.एम.ए. अथवा अभी भी अंग्रेजी चिकित्सकों की गुलामी करना अपना सौभाग्य समझते हैं, गुलामी भी उनकी करते हैं जिन्हें अपने प्रयोगशाला कृत रिसर्च पर भरोसा नहीं अपनी ही रिसर्च को कचरे के ठेर में डालकर उस पर नई रिसर्च थोप देते हैं। (निरन्तर ...अगले आलेख में )साथियों,मित्रों और सुधी पाठकों से आग्रह है इस पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें और साथ ही ये भी बताये कि श्री अशोक मनवानी के 15 अगस्त के विशेष लेख पर यह टिप्पणी कैसी लगी। 


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