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मध्य प्रदेश में सूचना तंत्र नाकारा या मुख्यमंत्री का दो मॅुहांपन?

                मध्य प्रदेश में सूचना तंत्र नाकारा या मुख्यमंत्री का दो मॅुहांपन?

भोपाल (पं.एस.के. भारद्वाज)राज्य में जनसंपर्क का दायित्व राज्य शासन की योजनाओं,गतिविधियों का प्रचार प्रसार के साथ ही राज्य में घटित होने वाली सभी गतिविधियों की जानकारी शासन तक पहुॅचाना हैै। और अतिथि विद्धानों की गिरफ्तारी पर मुख्यमंत्री का यह कहना कि इस घटना की जानकारी मुझे नहीं दी गई ,सूचना तंत्र का विफल होना माना जाय अथवा मुख्यमंत्री का दो मुॅहापन । वास्तव में यदि मुख्यमंत्री गिरफ्तारी से इतने व्यथित थे और वह ये मानते है कि उनके साथ अन्याय हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्यवाही करके स्वयं माफी क्यों नहीं मंाग लेते। वैसे म.प्र. के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के दूसरे नेताओं की व्यवहारिक तुलना में मृदुभाषी मिलनसार एवं संवेदनशील कहे जाते है। 19 अप्रैल 2015 को मुख्यमंत्री भोपाल में ही मौजूद थे। दिनभर के अनेकों कार्यक्रमों के साथ-साथ मुख्यमंत्री निवास में सायं 5 बजे से राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय पत्रकारों का उनकी अपनी जूरी द्वारा चयन कर उन्हें पुरस्कृत करने का आयोजन भी स्वयं श्री शिवराज सिंह चौहान ने रखा था। इस आयोजन के लिए देश की राजधानी सहित अन्य प्रान्तों व मध्यप्रदेश के कोने-कोने से पत्रकारों का आगमन हुआ । इनके स्वागत के लिए मुख्यमंत्री निवास से लेकर पूरे भोपाल में प्रचार प्रसार सामिग्री हर चौक -चौराहों पर लगाकर आयोजन की भव्यता का प्रदर्शन की कराया गया।     उसी दिन सरकार की कार्यप्रणाली से नाराज प्रदेश भर के अतिथि विद्धान(शिक्षक)मुख्यमंत्री से मिलना चाह रहे थे। इसके लिए पूरे प्रदेश से प्रात:काल से ही मुख्यमंत्री निवास के प्रवेश द्वार के सामने पॉलीटेक्रिक चौराहे पर एकत्रित होने लगे थे। जिन्हें पुलिस और प्रशासन ने मिलने तो नहीं दिया मगर शाम होते होते उन्हें गिरफ्तार करके जेल के दरवाजे तक जरूर भेज दिया। अतिथि विद्धानों में 194 महिलाऐं तथा 551 पुरूष सहित कुल 745 लोग मौजूद थे । जिनमें कुछ पर पुलिस ने धारा 151 तथा शेष पर दूसरी अन्य धाराऐं लगाकर कानूनी कार्यवाही कर दी। इस पूरे घटनाक्र म में पूरे दिन मुख्यमंत्री निवास के चारों ओर गहमागहमी बनी रही। शाम को जिस समय मुख्यमंत्री निवास में मेहमान रूपी वरिष्ठतम और वरिष्ठ पत्रकारों का सरकार और उनके मुखिया मुख्यमंत्री सम्मान कर वाह़! वाह! के नारे लगवा कर पंडाल में मौजूद दर्शकों से तालियॉ ठुकवा रहे थे उसी समय प्रदेश के भविष्य निर्माताओं को पुलिस डण्डों से ठोक-ठोक कर गाडिय़ों में भर-भर कर केन्द्रीय जेल ले जा रही थी। यहां भी उनका दुर्भाग्य देखिए, जेल नियमानुसार सूर्यास्त के उपरान्त जेल में नई आमद नहीं लेने के नियम के कारण पूरी रात जेल गेट पर ही खुले में बिताना पड़ी। उन्हें न भोजन पानी मिला न मूलभूत सुविधाऐं।  

     19 अप्रैल 2015 को मुख्यमंत्री भोपाल में ही मौजूद थे । दिन भर के अनेकों कार्यक्रमों के साथ-साथ मुख्यमंत्री निवास में भी राष्ट्रीय स्तर का आयोजन था। मुख्यमंत्री निवास के गेट के सामने धरना कार्यक्रम था ,उसी गेट से मुख्यमंत्री का दिनभर आना जाना लगा रहता है। चूॅकि पत्रकारिता पुरस्कार वितरण का कर्यक्रम था सो पूरा जनसंपर्क विभाग का पूरा अमला अर्थात प्रमुख सचिव एवं आयुक्त श्री एस.के मिश्रा,संचालक श्री लाजपत आहूजा,स्वयं विभागीय मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल सहित पूरा तंत्र मौजूद था जिसका काम केवल राज्य भर में हो रही सभी गतिविधियों,घटनाओं की सूचनाऐं एकत्रित करना ,सरकार को बताना , प्रसारित करना और कराना है। यह अमला इस लिहाज से और ज्यादा सक्रिय था कि पुरस्कार वितरण आयोजन में संघ और उससे जुड़े पत्रकार लोगों का ज्यादा संख्या में आना भी था।     दिनांक 20 अप्रैल को सिविल सर्विस डे के आयोजन में मंच से यह कहना कि इस घटना से वे अनभिज्ञ रहे चंूकि उन्हें संबंधित अधिकारियों ने बताया नहीं था। कहीं से भी यह बात गले नहीं उतरती है। मेरी बिना जानकारी के उन्हें जेल भेज दिया । मेरी इच्छा हुई थी कि  मैं उनसे जेल में जा कर मिलूॅ। इस प्रकार का एक वक्तव्य प्रदेश के उच्च संवैधानिक पद धारक कहे तो बड़ा दु:खद लगता है। इससे तो ऐसा लगता है कि प्रदेश के आम आदमी और मुख्यमंत्री में कोई अन्तर नहीं है। जिसका न कोई सुनने वाला है न कोई उसे बताने वाला है। वो जैसा भी जीवन जीता है अपनी मेहनत,कर्म,भाग्य और भगवान भरोसे। कानून और सरकार के सहयोग की उसे कोई ज्यादा उम्मीद नहीं होती है।    

     अब प्रश्र उठता है कि एक वार मान भी लें कि जिम्मेदार अधिकारियों ने नहीं बताया। तो जानने के बाद जबावदेही किस-किस अधिकारी की तय थी और प्रात: समाचार पत्रों की सरकारी कटिंग (जो जनसंपर्क विभाग का पूरा अमला ही पहुचाता है )पढऩे के बाद भी क्या किसी अधिकारी को दोषी माना या कोई कार्यवाही की? दूसरी ओर मुख्यमंत्री जी भी  निवास से भी कई बार निकले होगे वहीं पूरे क्षेत्र में जगह जगह सुरक्षार्थ कैमरे लगे है जिनका नियन्त्रण भी मुख्यमंत्री निवास से ही होता है। राष्ट्रीय स्तर के अनेको मूर्धन्य वरिष्ठतम पत्रकार भी मौजूद रहे,मगर यह कैसी व्यवस्था कि 745 लोगों को बलपूर्वक पुलिस उठाकर ले गई और मुखिया को पता ही नहीं चला। न राष्ट्रीय पत्रकारों को न प्रदेश सरकार के मुखिया को । जबकि भोपाल  पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि  मुख्यमंत्री जी को उनके स्टाफ के उपसचिव श्री एम.आर.खान के द्वारा सूचना और मांग पत्र देकर सूचित किया गया था,तथा वहां पर मौजूद अधिकारियों में जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी एवं जिला प्रशासन के दर्जनों अधिकारियों के साथ-साथ मुख्यमंत्री स्टाफ के अधिकारी भी मौजूद थे। सायं मुख्यमंत्री निवास में आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार प्राप्त करने वाले धुरंधर पत्रकारों,जिन्हें उनके लेखन और प्रतिभाओं के लिए पुरस्कृत किया गया था,उन बेवस अतिथि विद्धानों पर उनकी भी नजरें इनायत नहीं हुई। तो क्या फिर ये मान लिया जाय कि उन्हें सिर्फ इसी बात का पुरस्कार दिया गया है कि वे कुछ न देंखें । अगर मुख्यमंत्री जी वास्तव में अतिथि विद्धानों के घावों पर मरहम लगाना है तो सबसे पहले उस तंत्र का गिरेबंा पकडऩा होगा जो इसके लिए दोषी है और कार्यवाही भी करनी होगी। अन्यथा आपके श्रीमुख से निकले शब्दों का समाज में कोई मोल नहीं है। जनता की नजर में सिर्फ सफेद झूठ भरे घडिय़ाली आंसू है । उच्चस्तरीय संवैधानिक पद पर रह कर झूठ का प्रचार करना कहीं से भी उचित नहीं है न सरकार के लिए न जनता जनार्दन के लिए ।   


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