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मतदान होता तो न मिलता बीजेपी को बहुमत

अब सबके लिए यह रहस्य बन गया है कि आखिर क्या कारण है कि महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए बीजेपी ने 'असंवैधानिक' तरीकों का इस्तेमाल तक कर लिया और पहली ही बार में ध्वनिमत से विश्वासमत हासिल करने का रास्ता चुना? बीजेपी ने महाराष्ट्र में छह महीने के लिए सरकार का कार्यकाल तो पक्का कर लिया लेकिन पूरे देश में बीजेपी की किरकिरी हो गयी। तो आखिर क्या कारण है कि बीजेपी ने महाराष्ट्र में अल्पमत की सरकार बचाने के लिए दोहरे समझौते किये।

19 अक्टूबर को परिणाम आने के तुरंत बाद एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने बिना शर्त बीजेपी को बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर दिया था। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी का विरोध करके सत्ता के दहलीज तक पहुंची बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने समर्थन लेने या न लेने की बात तो नहीं कही लेकिन इतना जरूर कहा कि उनकी तरफ से प्रस्ताव है। लेकिन इस प्रस्ताव का बीजेपी के भीतर जमकर विरोध शुरू हो गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा न तो बीजेपी के भीतर कोई एनसीपी से समर्थन के लिए तैयार था और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसकी हरी झंडी मिली थी। संघ के भीतर इस बात को लेकर गंभीर मंथन चला और शिवसेना को ही महाराष्ट्र में साथी दल बनाकर रखने का संकेत दिया गया।

  • 40 भाजपा विधायकों ने दी थी अपने ही सरकार के खिलाफ मतदान की धमकी
  • एनसीपी से समर्थन किसी भी कीमत पर मंजूर न था
  • शिवसेना टूटने से पहले भाजपा के टूटने का खतरा पैदा हो गया था

बीजेपी के भीतर भी इस बात की कमोबेश एकराय थी कि शिवसेना के साथ ही गठबंधन करके महाराष्ट्र में सरकार चलायी जाए लेकिन यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह शिवसेना को दूर रखने के लिए दूसरी कई रणनीतियों पर भी काम कर रहे थे। समजा जाता है कि इस रणनीति के पीछे मुंबई के एक बड़े गुजराती उद्योगपति की भी बड़ी भूमिका थी जिनके इशारे पर प्रफुल्ल पटेल ने बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया था। इनकी रणनीति थी कि 12 नवंबर को एनसीपी को सदन से बाहर रखकर बहुमत सिद्ध कर लेंगे जिसके बाद शिवेसना के ही एक धड़े को तोड़कर राज्य में बहुमत हासिल कर लेंगे। इस संबंध में सुरेश प्रभु की पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी हो चुकी थी और खबर है कि अमित शाह ने शिवसेना के छह विधायकों से बात भी कर ली थी। सब कुछ ट्रैक पर ही चल रहा था लेकिन अचानक से एनसीपी से समर्थन के मुद्दे पर बीजेपी के ही भीतर उठे बगावत के सुर ने बीजेपी के रणनीतिकारों को आखिरी वक्त में सारी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया।

खबर है कि बीजेपी के भीतर ही 40 विधायकों ने बगावत कर दी थी और किसी भी कीमत पर एनसीपी से समर्थन न लेने का संदेश दे दिया था। इन विधायकों ने धमकी दी थी कि अगर महाराष्ट्र में बीजेपी एनसीपी से समर्थन लेकर बहुमत सिद्ध करती है तो वे खुद अपनी पार्टी के खिलाफ वोट दे देंगे। इन विधायकों में ज्यातार पार्टी के दिग्गज विधायक हैं जो पहले भी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतते रहे हैं। इनका तर्क था कि जिन कांग्रेस और एनसीपी के खिलाफ लड़ाई लड़कर उन्होंने चुनाव जीते हैं अगर उनसे ही समर्थन ले लिया तो किस मुंह से अपने चुनाव क्षेत्र में जाएंगे। इन विधायकों की धमकी का असर यह हुआ कि आखिरी वक्त में 'दिल्ली' ने महाराष्ट्र में अपनी रणनीति बदल दी और एनसीपी द्वारा समर्थन में बहिर्गमन के आश्वासन के बाद भी विधानसभा में वोटिंग करवाने से मना कर दिया। और ध्वनिमत से विश्वासमत हासिल कर लिया। बीजेपी को डर था कि अगर वे वोटिंग करवायेंगे तो विश्वासमत के दौरान सरकार गिर जाएगी।


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