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पवित्र पापी और अधर्मी , मुख्यमंत्री, शिवराज चौहान और नरेन्द्र मोदी

                                      पवित्र पापी और अधर्मी,मुख्यमंत्री, शिवराज चौहान और नरेन्द्र मोदी                       ेश की राजनीति में आजकल हर राजनेता अपने-अपने राजनीतिक हथकंडे अपनाकर स्वयं को राजा हरीश चन्द्र की तरह जनसेवक दानवीर और दल को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रवादी बता रही है तो वहीं विरोधी को आक्रमणकारी मौहम्मद गौरी के चरित्र जैसा और उसके दल को  देश का लुटेरा बताकर प्रचारित किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या देश का कोई भी प्रान्त सभी जगह एक जैसा माहौल निर्मित हो गया है। इस राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने हर राजनेता को व्यवसायी बना दिया है। जब एक राजनेता व्यवसायी बन जाय तो उसके लिए जाति,धर्म ,संस्कृति,परम्परा जनभावना कोई महत्व नहीं रखती। उसे सिर्फ शुद्ध लाभ चाहिए। उसके लिए वह स्वयं एक व्यवसायी की तरह जनता से झूठ बोलेगा ,छल कपट करेगा,धोखा देगा अच्छा लाभ मिलेगा तो घर का सामान भी बेच देगा ,मगर मिले उसे शुद्ध लाभ। देश में राष्ट्रीय स्तर के दो प्रमुख दल है। एक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, और दूसरी है भारतीय जनता पार्टी। देश में कांग्रेस ने लंबे समय से देश में राज किया है। भ्रष्टाचार की शुरूआत के लिए भी प्रथम है। इस दल के लोग आर्थिक दृष्टि से पहले संपन्न हो गये क्योंकि लम्बे समय से देश में सत्ता पर काबिज रहे है। कांग्रेस दल देश का सबसे पुराना दूसरे नंबर का पंजीकृत राजनीति दल है। एक दल है भारतीय जनता पार्टी के 1980 में  गठन करने वालों का बुदियादी जीवन ही छल कपट और अपनो से धोखा देने वालों का रहा है। देश का प्रथम स्थापित राजनीतिक दल अखिल भारत हिन्दू महासभा था जिसकी स्थापना सन् 1838 में हुई थी। इस दल ने देश की स्वाधीनता,धर्म संस्कृति के लिए कार्य किया और देश में पहली बार सन् 1909 में पहला आम चुनाव लड़ा था। तत्कालीन अविभाजित देश में सेन्ट्रल असेम्बली की तीस सीटें हुआ करती थी । सन् 1909 के आम चुनाव में अखिल भारत हिन्दू महासभा ने 30 में से 18 सीटें जीत कर एक इतिहास बनाया था। यह आम चुनाव विशुद्ध रूप से स्वाधीनता,हिन्दू धर्म संस्कृति के सिद्धान्तों और जनप्रतिनिधियों के राष्ट्रवादीआचरण के आधार पर लड़ा गया था। अखिल भारत हिन्दू महासभा के कुछ तत्कालीन स्वार्थी तत्व अलग होकर 1950 में हिन्दुत्व के नाम पर अपना स्वार्थ तलाशने लग गये। 15अगस्त सन् 1947 को देश की स्वाधीनता और 26 जनवरी 1950 से देश में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद से देश में विपक्षी दल की भूमिका में सत्ताधारी दल कांग्रेस के सामने विपक्ष की भूमिका में कोई मजबूत राजनीतिक दल नहीं था। क्योंकि स्वाधीनता के बाद मुस्लिम लीग पार्टी पाकिस्तान में चली गई और अखिल भारत हिन्दू महासभा के लोग अधिकांशत: कुछ स्वार्थी तत्वों के कारण बिखर गये थे। 1952 में पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं दीनदयाल उपाध्याय सहित 52 लोगों ने भारतीय जनसंघ नाम के राजनीतिक दल का गठन किया । पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं दीनदयाल उपाध्याय के देश प्रेमी जनसेवा के कट्टर समर्थक होने के कारण पूरी कांग्रेस बहुत डरती थी। उस समय के तत्कालीन जननेता श्री बलराज मधोक के निजी सचिव (बेतन भोगी कर्मचारी)श्री लालकृष्ण आडवानी ने भी नैकरी के साथ-साथ राजनीतिक हथकंडे सीखना चालू कर दिया था। 1967 तक भारतीय जनसंघ  देश का प्रमुख विपक्षी दल बन गया था। उसकी चार राज्यों में संविद सरकार गयी थी और लोकसभा में 37 सदस्य पहुॅच चुके थे। परन्तु जैसे ही पं पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीन दयाल उपाध्याय की इस दुनिया से बिदाई हुई तो श्री लालकृष्ण आडवानी और उनके हमराज हम सफर साथियों ने भारतीय जनसंघ पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और 1977 में दल को भी पूरी तरह समाप्त कर दिया । श्री लालकृष्ण आडवानी ने भारत का प्रधानमंत्री बनने की लालसा में हर वो काम किया है जो एक व्यवसायी करता है। सन् 2004 तक ऐड़ी चोटी का खूब जोर लगा लिया जो भी उनके सामथ्र्य में थे सारे हथकंडे अपना लिए । सन् 2004 के बाद जैसे ही लगा कि देश के लोग उनकी मंशा को भांप चुके है,व्यवसायिक मानसिकता के लोगों को देश की जनता स्वीकार नहीं करेगी तो उन्होंने देश में अपने दो ऐसे शिष्यों को शिखर पर लाने की योजना बना ली है। जिनके माध्यम से अपनी हर महत्वाकांक्षा की पूर्ति की जा सकती है। जिसमें एक है गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और दूसरे है म.प्र. के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान। ये दोनों ही शिष्य श्री आडवानी से ही राष्ट्रीय स्तर पर जनता को ओजस्वी भाषणों से सम्मोहित करने और उनके दु:खों की करूणामयी चर्चा करके बेवकूफ बनाने और लाभकारी राजनीति उद्योग को विस्तार देने के लिए विशेष शिक्षा ग्रहण किये हुए है। आज ये दोनों शिष्य देश भर में अपनी कूटकला और धूर्त कौशलता का जोर शोर से प्रदर्शन कर रहे है। श्री आडवानी की तरह ये दोंनों शिष्य भी अति महत्वाकांक्षी ही नहीं आक्रामक भी हो गये है। अब ये दोंनों भी अपने गुरू की तरह देश में प्रधानमंत्री बनने का भरपूर प्रयास कर रहे है। अपने कुत्सित प्रयासों मेें इन्होंने कानून विरोधी,हिन्दुत्व विरोधी ,धर्मविरोधी कार्य भी खूब किये है। भारत की सभ्यता और संस्कृति  को भी तार-तार किया है। बात करे अपने कार्यकाल में जनसेवा की तो 30 प्रतिशत जनहित के कार्य किये है तो 70 प्रतिशत शुद्ध व्यवसायी बनकर कार्य किये है। से लोग सरकार नहीं बल्कि मानों बहुराष्ट्रीय कंपनियां चला रहे है। स्वास्थ्य सेवा हो,आम जरूरत के लिए कलेक्टर, तहसीलदार के यहां कार्य कराना हो या भूखे को भोजन देने काम हो अथवा पूजापाठ या धार्मिक स्थान, हर जगह सरकार द्वारा निर्धारित कंपनियों की फीस और दलालों की दलाली बहुत आवश्यक है। राज्य भर में कोई भी कार्य बिना शुल्क चुकाये नहीं हो रहा। इन्हें तो श्मशान में जलने वाली चिता की लकड़ी में भी कमीशन चाहिए। और कब्रिस्तान के कॉफिन में भी दलाली। हमारे भारत देश में नदियों का बहुत बड़ा महत्व है वे देश की जीवनदायिनी है। उन्हें मां का दर्जा मिला है। मध्यप्रदेश की दो प्रमुख नदियां है ताप्ती और नर्मदा । नर्मदा मध्यप्रदेश के अमरकंटक से उद्गम होकर गुजरात से निकलकर श्रीलंका के पास अरब सागर में गिरती है। भारत के पुराणों में दर्ज है,देश के जन जन के मुंह से  सुना जा सकता है,सन्त महात्माओं के प्रवचनों में सुनने को मिलता है कि नर्मदा कुॅआरी है। देश की अन्य नदियों के विरूद्ध विपरीत धारा में बहती है। देश की अन्य नदियों की तुलना में ज्यादा धार्मिक महत्व है। इसी कारण कभी भी कोई भी कुॅभ मेले का आयोजन भी नर्मदा नदी के तट पर नहीं किया जाता क्योंकि कोई भी धर्मगुरू,नागा बाबा नर्मदा में स्नान नहीं करते है। परन्तु अपनी व्यावसायिक हटधर्मिता के लिए श्री लालकृष्ण आडवानी के दोनों शिष्यों ने नर्मदा नदी को दूसरी विपरीत धाराओं वाली नदियों में मिलाने का पाप किया है। इन्होंने अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के चलते नर्मदा नदी के तटपर मेले लगाकर कुंभ का नाम देने का भी प्रयाय किया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह तो नर्मदा तट पर बसे गॉव जैत में ही पैदा हुए बताते है, और अपने आप को मॉ नर्मदा का अनन्य भक्त ,जबकि सत्यता यह है कि श्री शिवराज सिंह जनता को सबसे ज्यादा भरोसा मॉ नर्मदा के किनारे खड़े होकर दिया और धोखा भी मॉ नर्मदा के भक्तों को वहीं खड़े होकर दिया है। कभी मॉ नर्मदा की कसम खाकर कभी मॉ नर्मदा को क्षिप्रा में मिला कर । श्री आडवानी के दूसरे शिष्य श्री नरेन्द्र मोदी ने तो मॉ नर्मदा को दर्जनों ेंस्थानों पर अन्य विपरीत धाराओं वाली नदियों में मिला कर भारतीय सभ्यता के साथ घोर पाप किया है। लालकृष्ण आडवानी हों ,या इनके शिष्य द्वय श्री नरेन्द्र मोदी,श्री शिवराज सिंह चौहान ये सभी विशुद्ध रूप से अपने-अपने राजनीतिक उद्योग चला रहे है। इन्हें देश की धरोहर,संस्कृति,सभ्यता,रीति रिवाज परम्परा से कोई सरोकार नहीं है। ये लोग प्रशासनिक व्यवस्था को निजी कंपनियों /ठेकेदारों के हाथों में सौप कर कमीशन और अपने निजी लाभ में तल्लीन है। इनके राज में अगर एक वर्ष का एक लाख करोड़ का विधान सभा में बजट पेश होता है, तो माना जा सकता है कि सौदेबाजी कमीशन ट्रान्सफर,पोस्ंिटग,दलाली,सट्टा जुआ आदि का वार्षिक बजट का दस गुना दस लाख करोड़ का ब्लैक मनी का कारोबार होता है। शिवराज शासित राज्य में जब से नर्मदा और क्षिप्रा के मिलन की शुगबुआहट हुई थी उसी दिन से प्रदेश में प्राकृतिक आपदाओं की शुरूआत हो गई थी । राजनीतिक व्यवसाय में मुग्धों को भनक नहीं लगी और आज पूरे प्रदेश में विकराल प्राकृतिक आपदा की स्थिति निर्मित हो गई है। स्पष्ट है यह मॉ नर्मदा का गुस्सा है जिसका खामियाजा प्रदेश ही नहीं देश के कई अन्य राज्य भी भुगत रहे है। आज समाज के बुद्धिजीवी ,ब्राह्मण,संत धर्मबन्धु चिन्तित है । आने वाले समय में मॉ नर्मदा कहीं और रौद्र रूप धारण न कर ले । राज्यों में सत्ताधारी राजनेता इतने स्वार्थी बन गये है कि राष्ट्र भक्त,धर्म रक्षक ,सामाजिक चिन्तक,से ज्यादा नेता विशेष के चाटुकार ज्यादा बन गये है। उनके घरों में अपने सगे माता पिता,गुरू का एक भी फोटो टंगा हो या न हो परन्तु सत्ताधारी नेता के साथ बड़े-बड़े विशालकाय होर्डिग बोर्ड मुख्य चौराहों पर अवश्य नजर आ जायेगे।    मध्य प्रदेश में नर्मदा क्षिप्रा लिंक परियोजना के ही उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस परियोजना से प्राप्त जल का उपयोग 2016 में प्रायोजित बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में धार्मिक आयोजन महाकुंभ के मेले में करने के लिए अपनी सरकार में निर्णय लिया। इस परियोजना के लिए लगभग 396 करोड़ रूपये निर्माण कार्य संपन्न करने वाली हैदराबाद की कंपनी मेघा इंजीनियरिंग को किया है। जिसके प्रचार के श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता वाले संस्थान मध्यप्रदेश माध्यम ने 436 करोड़ रूपये की लागत का विज्ञापन तैयार कर जनसंपर्क विभाग के माध्यम से जारी कराया था। इस विज्ञापन में अधिक राशि दर्शाने का उद्देश्य आज तक रहस्य बना हुआ है। प्रायोजित महाकुंभ मेले में जल के उपयोग के प्रचार को भी भ्रामक तरीके से प्रचारित किया गया। कुंभ का मेला हर बारह साल में एक बार एक माह के लिए लगता है,जल की आवश्यकता अधिकतम दो माह के लिए होती है।  तो फिर प्रचार प्रसार अनुसार 11 वर्ष 10 माह नर्मदा जल का क्या होगा। सही तथ्य यह है कि धार जिले के पीथमपुर तथा देवास के औद्यौगिक क्षेत्रों को प्रचुर मात्रा में जल की निरन्तर आवश्यकता होती है। उसी के लिए इस परियोजना का तत्परता से क्रियान्वयन कर बिना कोई संवैधानिक नियम प्रक्रियाओं को अपनाये पूर्ण कराया गया । क्षेत्रीय लोगों में जन चर्चा है कि यहां संचालित अथवा स्थापित की जाने वाली कई कंपनियों में प्रदेश के मंत्रियों और मुख्यमंत्री के नजदीकी सहयोगियों की बेनामी सहभागिता होने के कारण इस परियोजना पर काम आनन फानन में किया गया। नर्मदा क्षिप्रा लिंक परियोजना के पीछे श्री शिवराज सिंह चौहान का एक मात्र उद्देश्य उद्योगो को लाभ पहुॅचाना है। इसी लिए क्षिप्रा नदी के स्थान पर पहुॅचने से पूर्व ही जल प्रवाह को पीथमपुर की ओर मोड़ दिया गया है। इस परियोजना के लिए न तो पर्यावरणीय,प्राकृतिक प्रभाव आंकलन किया गया और न ही संविधान संबंधी निर्धारित मापदण्डों के लिए कोई प्रशासकीय नियमों का पालन किया गया है। इस परियोजना के लिए ओंकारेश्वर परियोजना से पानी लिफ्ट करके लिया गया है। जिसे लगभग 400 मीटर अलग अलग स्थानों पर पंपों के माध्यम से लिफ्ट करके उज्जैन तक लाने का काम किया गया है। इस परियोजना के संबन्ध में जनता के बीच बताये जा रहे सरकारी प्रचार के माध्यम से आंकड़े और परियोजना की सफलता में भी बहुत बड़ा अन्तर है। अर्थात सरकारी प्रचार के अनुसार इस परियोजना से पूरा मालवांचल को सिंचित करके हरा भरा किया जायेगा,जबकि  वास्तविकता यह है कि निमाड़ क्षेत्र के किसान वर्षो से लंबित ओंकारेश्वर परियोजना की पूरी होने की बाट जोह रहे थे । अब नर्मदा का जल न तो उज्जैन तक इतने प्रवाह से पहुॅचेगा कि मालवा का भला कर सके और निमाड़ का किसान पहले से ही प्यासा था और अब ओंकारेश्वर कैनाल का जल लिफ्ट होकर औद्योगिक क्षेत्र में जाने के बाद  सूखा,सूखा ही रहेगा। नर्मदा क्षिप्रा लिंक परियोजना के निरन्तर बने रहने में भी संदेह है । इसमें प्रतिदिन मिलने वाले जल की तुलना में खर्च बहुत अधिक होगा। जो सामान्य तौर पर बहुत मुश्किल है। मगर परियोजना सफल हो या फेल धर्म की आड़ में श्री शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक उद्योग, धन्धा तो जोरों पर चलने लग गया है,और अधिक उत्साहवर्धन करने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री के चाटुकारों ने नारा दे दिया है कि हर-हर मोदी,घर-घर मोदी , तो शिवराज सिंह चौहान के चाटुकारों ने नारा बना दिया है-नर्मदा हमारी माई है ,शिवराज हमारा भाई है। अर्थात चाटुकारों की नजर में दोंनों ही मानव जाति से बहुत ऊपर देवतुल्य प्राणी हो गये । माना कि आम जनता सीधी और भोली है परन्तु नादान नहीं है। ये न किसी राजघराने से है ,न ठाकु र न ब्राह्मण परिवार से,और न कोई देश भक्त स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी परिवार के सपूत ,और न कोई खेतिहर किसानपुत्र जो अपनी और समाज में बोले हुए वचन का महत्व समझें और मर्यादा का पालन कर सकें। प्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की बदली हुई अहंकारी भाषा,को देख कर भांप रहे है। व्यावसायिक ,कूटरचना के माहिर आपराधिक मानसिकता के नजदीकी भ्रष्ट अधिकारियों का साथ जीवन भर थोड़े ही चलने वाला है।भोपाल में आज भी शिवराज सिंह चौहान के पुराने साथी है जिनका कर्जा कभी नहीं चुकाया जा सकता,वे आज बेईमानी और भ्रष्टाचार के दम पर अकूत संपत्ति के विस्तार और भव्यता की राजनीति भी देख रहे है। उनके पुराने जानने वाले नहीं चाहते कि शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में 2016 का महाकुॅभ संपन्न हो,कल तक हर हिन्दुत्व के मुद्दे पर ,बसंन्त पंचमी पर्व पर धार में सरस्वती प्रतिमा के लिए और राममंदिर की बात पर मुखर होने वाला शिवराज आज उद्योगपतियों का साथी बन गया है। राजा महाराजाओं की तर्ज पर प्रदेश की जनता को खूब दान बॉटने की बात करता है वहीं दूसरी ओर यही दान का धन जनता से कंपनियों के माध्यम से कई गुना बसूल करा रहा है। श्री शिवराज सिंह चौहान ने पद प्रतिष्ठा को लज्जित करके अपनी निजी महत्वाकांक्षा के लिए समाज और हिन्दू संस्कृति का सौदा कर बेच दिया है। जिसके पाप के परिणाम निरीह जनता को भुगतने पडं़ेगे। वहीं कुछ लोग आज भी आशान्वित है कि आज नहीं तो कल इन्हें सद्बुद्धि अवश्य आयेगी।और वे पश्चाताप भी करेंगे।                        

      सेवा,स्वास्थ्य,प्रचार विभाग के दफ्तरों को व्यवसाय,उद्योग बनाया,                       

          लेकर मोटी फीस गरीबों को चूसा,विकास सपनों में कराया।                     

         कमीशन खाकर मौन है पहरेदार,कोई भी जनता के काम न आया।।           

               दस साल में प्रदेश का एक ही मुनादी वाला चेहरा सामने आया,         

                   शिवमयी भव्य तंबुओं की पंचायतों में,सपना खूब दिखाया।         

                 प्रदेश की बेच संपदा ,दान ,सुविधा दे जनता को गुमराह कराया।।                         

              राजनीतिक व्यापार लाभ अपना और परिवार का,कर्ज जनता पर बढ़ाया ,                                                         चाटुकरों,माफियाओं को गले में बॉधा,राष्ट्रभक्तों को दूर भगाया।                                       

                           हुई भाजपा बदनाम ,प्रशासन को भ्रष्ट बनाया।।                             

                         // हिन्दुत्व विरोधी,झूठे,आंकड़ो का झूठा प्रचार   //                                     

                                    यही है मध्यप्रदेश सरकार 


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