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निजी अस्पतालों में हो रही लूट में सरकार की साझेदारी या ठेकेदारी!

निजी अस्पतालों में हो रही लूट में सरकार की साझेदारी या ठेकेदारी!

भोपाल। (सुरेश शर्मा)आम आदमी की आस होती है कि उसे सही और सस्ता ईलाज मिले। लेकिन सरकारी अस्पतालों की भर्राशाही के चलते निजी नर्सिंग होम्स पनप रहे हैं। सरकार की बेरूखी से ये नर्सिंग होम्स मरीज की जेब नापने में तनिक भी देरी नहीं करते हैं। मरीज बचाना है इस भाव का दोहन होता है, मरीज तो ठीक भी हो जाता है लेकिन बिल की रकम देखकर परिवार जरूर बीमार हो जाता है। निजी नर्सिग होम्स की इस भयावह स्थिति के साथ तथ्य यह भी बताते हैं कि सरकार या नौकरशाही इसके सामने या तो लाचार है या भागीदार। पेश है एक रपट।

संस्कृत के एक श्लोक का अर्थ है- हे, यमराज के बड़े भाई वैद्यराज तुझे नमन है। यमराज तो केवल प्राणों को हरता है लेकिन तुम तो प्राण और धन दोनो हर लेते हो। श्लोक बनाने वाले ने किस भाव से इसे बनाया यह तो पता नहीं है लेकिन जब नर्सिंग होम्स से निकलते मरीजों को देखते हैं तो यह अर्थ सटीक बैठता हुआ दिखाई देता है।

डाक्टर के क्लीनिक और नर्सिंग होम्स में ओपीडी के मामले में अन्तर करना होगा। क्योंकि फीस को लेकर सबसे अधिक शिकायत है। डाक्टर पर्चा लिखने के नाम पर 150 से 300 रुपये तक ले रहे हैं। क्लीनिक में तो समझ में आता है कि फीस का निर्धारण हो लेकिन नर्सिंग होम्स की ओपीडी में फीस का निर्धारण सामान्य सी रकम होना चाहिये। नर्सिंग होम्स में भर्ती के बाद मरीज की जेब नापने की तरफ अधिक ध्यान होता है ईलाज की तरफ उतना नहीं होता है। यहां रिश्ेप्शन में बैठा 

स्टाफ इस गुणा भाग में लगा रहता है। मरीज के ईलाज के बाद बिल को देखिये। उसमें कमरे का लग्जरी चार्ज लगा होता है। आईसीयू के कक्ष का किराया 1500 से शुरू होता है। सामान्य कमरों का किराया 500 से 1500 रुपये तक होता है जबकि हरेक नर्सिग होम्स में  लग्जरी और डीलेक्स कमरे भी होते हैं। मरीज अपनी सुविधा के अनुसार इनका भी उपयोग करता है। सामान्य वार्ड का किराया भी कोई कम नहीं होता है। यह तो केवल एक बात है। और भी चौकाने वाली बातें सामने आईं हैं।

नर्सिग होम्स के संचालक जिस विद्या में पारंगत हैं उसके अलावा बीमारी के मरीजों को भी भर्ती कर लेते हैं। यहां से शुरू होता है मरीजों की लुटाई का नया दौर। जो डाक्टर खुद यह नहीं जानता है कि मरीज का ईलाज किस आधार पर किया जाये वह सबसे पहले अपनी फीस रखवा लेता है। इसके बाद संबंधित डाक्टर को बुलाया जाता है। इसे डाक्टर की विजिट फीस बताया जाता है। यह एक बार तक सीमित नहीं होती है डाक्टर साहब जितनी बार भी विजिट करेंगे मरीज के माथे लिखी जाती रहेगी। कई बार तो होता यह है कि डाक्टर साहब किसी और विजिट के लिये आये थे दूसरे मरीज के हालचाल पूछ लिये लेकिन 300 रुपये का फटका इस मरीज को भी लग गया। यह गौरख धंधा है और सब जानकारी होते हुये भी न तो विभाग के अधिकारी और न ही सरकार इस बारे में कोई कदम उठाने की सोच रहे हैं। नर्सिंग होम्स में धन कमाने का दूसरा आधार होता है नर्सें। नौकरी के आधार पर काम करने वाली इन नर्सों के नाम पर प्रत्येक मरीज से 100 रुपये प्रति दिन के मान से लिये जाते हैं। इनमें से नर्सों को कितने मिलते पता नहीं है।

लगभग नर्सिंग होम्स में लेब स्थापित हो गये हैं। कई नर्सिंग होम्स के होते हैं तो कई किराये से स्थापित करवा लिये जाते हैं। डाक्टर साहब जांच के लिये सबसे पहले लिखते हैं। कोई आशंका हो तो जांच कराने में कोई परेशानी नहीं होना चाहिये। लेकिन जानकारों का कहना है कि 90 प्रतिशत परचे वही रहते हैं जो जांच के पहले लिखे जाते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि मोटा कमीशन खाने के लिये जांच कराई जाती है ईलाज की सुविधा के लिये नहीं। कई बार तो ऐसे विषयों की जांच करा ली जाती है जिसका बीमारी से कोई संबंध ही नहीं होता है। हर नर्सिंग होम्स में मेडीकल स्टोर खुल गये हैं। बाजार भाव से महंगे होते हैं ये, लेकिन मरीज का ध्यान रखने वालों को दवा का हिसाब रखने की फुर्सत कहां? और इसी का लाभ उठाया जाता है। भाव भी बढ़ते हैं और इवाई भी। ऐसे में मरीज को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

आपको वह दिन याद होगा जबकि आपके यहां या आपके मित्र के यहां बच्चा जन्मा होगा। सोनोग्राफी रिपोर्ट में सब सामान्य रहते हुये भी बच्चा आपरेशन से पैदा हुआ होगा? ऐसा क्यों? क्योंकि सामान्य जन्म में जो लाभ नहीं होता उससे अधिक लाभ आपरेशन से बच्चा पैदा होने पर होता है और डाक्टरी भाषा में इसे खोल कर बच्चा पैदा करवाना कहते हैं। इस तरह मरीज लुटता है लेकिन संरक्षण देने वाले मौन रहते हैं।

इधर चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री महेन्द्र हार्डिया ने बताया कि नर्सिग होम्स के लिये एक्ट बना हुआ है। इसका शक्ति से पालन होना चाहिये। जो नहीं हो पा रहा है। हम इसकी जरूरत महसूस करते हैं। जहां तक डाक्टरों की फीस, अस्पताल के कमरे तथा जांच कराये जाने की बातें हैं सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस प्रकार से नर्सिंग होम्स का जाल फैल रहा है सरकार की जिम्म्ेदारी बनती है कि वह इस दिशा में सोचे। हम जरूर इस बारे में सोचेंगे।


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