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मोदी पर कलह

   


बीजेपी में नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के टकराव ने दिलचस्प रूप ले लिया है। जिस तरह अचानक जोशी के पक्ष में अहमदाबाद और दिल्ली में पोस्टर लगे, उससे साफ है कि पार्टी में एक बड़ा तबका मोदी कोनापसंद करता है। मुंबई कार्यकारिणी बैठक के बाद मोदी समर्थकों ने कुछ इस तरह का माहौल बनाया कि नरेंद्र मोदी पार्टी के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर आए हैं। लेकिन खुद गुजरात में कई सीनियर लीडर उनके खिलाफ सक्रिय हो गए हैं।

पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश और संघ के हिंदी मुखपत्र पांचजन्य में घुमा-फिराकर मोदी पर निशाना साधा गया तो संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर में उनकी तारीफ भी की गई। यह इस बात का संकेत है कि मोदी को लेकर इन दिनों संघ और बीजेपी में मंथन जारी है और उन्हें पार्टी का चेहरा बनाने पर आम सहमति अब भी नहीं बन पाई है। आम तौर पर समझा जाता था कि संघ ही अंतिम निर्णय करता है और बीजेपी उसे आंख मूंदकर स्वीकार कर लेती है। लेकिन इधर वह रिश्ता थोड़ा बदला है।

संघ ने कई मामले में लचीला रुख अपनाया। कभी उसने बीजेपी के लिए दिशा तय की तो कभी बीजेपी को भी अपना रास्ता तय करने दिया। यानी चीजें एकतरफा नहीं हैं, दोनों एक-दूसरे के निर्णयों पर असर डाल रहे हैं। मोदी को लेकर दोनों जगह संशय साफ देखा जा रहा है। इस बात को तो महसूस कर लिया गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को नए चेहरे की जरूरत है, लेकिन चेहरा चुनना आसान नहीं है। हाल के वर्षों में पार्टी में विचार या सिद्धांत पर व्यक्तिवाद हावी हुआ है। नेताओं में अपना वर्चस्व कायम करने की होड़ सी लगी हुई है। उनके छोटे-छोटे गुट बन गए हैं जो एक-दूसरे को मात देने में जुटे हैं। ये पार्टी के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने या जनता के बीच काम करने से ज्यादा रुचि एक-दूसरे के खिलाफ दांव आजमाने में लेते हैं। इससे पार्टी को लेकर आम आदमी में निराशा पैदा होने लगी है। बीजेपी अगर फिर से सत्ता में आना चाहती है तो उसे नेतृत्व के सवाल को समझदारी से सुलझाना होगा। पार्टी में वैचारिक लड़ाई तो ठीक है, पर वह नेताओं की नाक की लड़ाई में बदल जाए तो उसका पार्टी पर बुरा असर पड़ता है।




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