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भाजपा की बूढ़ी बुआ लालकृष्ण आडवाणी !




नई दिल्ली [विवेक सक्सेना] पार्टी नेतृत्व की तरफ से की जा रही अपनी उपेक्षा से दुखी वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी खुद को उस बूढ़ी बुआ की तरह महसूस कर रहे हैं, जिसके पैर तो सब छूते हैं पर परिवार में कोई सलाह नहीं लेता। राजधानी में रहते हुए पदाधिकारियों की बैठक का बायकाट कर वे अपनी नाराजगी भी जता चुके हैं। अब नेतृत्व को यह डर सता रहा है कि कहीं वे राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपनी भावनाओं को स्वर न दे दें।

पिछले लोकसभा चुनाव तक राजग की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार माने जाते रहे लालकृष्ण आडवाणी आजकल बेहद दुखी हैं। इसकी वजह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से उनके साथ किया जा रहा बर्ताव है। इन दिनों मिलने आने वालों से वह दुखी होकर अक्सर कहते हैं कि दीनदयाल उपाध्याय व अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे वरिष्ठतम नेता भी कोई अहम फैसला लेने से पहले मुझसे सलाह लिया करते थे। लेकिन आज पार्टी में इनसे भी बड़े नेता आ गए हैं, जो मुझसे बात तक करने की जरूरत नहीं समझते हैं।

यह महज संयोग ही कहा जाएगा कि उनके करीबी माने जाने वाले नेता जैसे वसुंधरा राजे, अनंत कुमार, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज भी नेतृत्व से खुश नहीं हैं। आडवाणी की ताजा नाराजगी की वजह हाल के राज्यसभा चुनाव में झारखंड से पार्टी उम्मीदवार एसएस आहलुवालिया का हारना है। इसे वे अपनी व्यक्तिगत हार मान रहे हैं। वे यह मानते हैं कि उन्हें जानबूझ कर हरवाया गया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक पहले इस चुनाव में अंशुमान मिश्र को उम्मीदवार बनाए जाने का आडवाणी गुट ने विरोध किया था।

यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेता ने तो टिकट बेचे जाने तक का आरोप लगाया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अंशुमान ने आडवाणी समेत उनके खेमे के तमाम नेताओं को निशाना बनाया था।
राज्यसभा चुनाव रद्द होने पर जब आहलुवालिया को उम्मीदवार बनाया गया तो खुद आडवाणी ने जद (एकी) अध्यक्ष शरद यादव को फोन करके उनकी सहमति ले ली थी। वहां अपना

मुख्यमंत्री व सरकार होने के बावजूद आहलुवालिया हार गए। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी जीत सुनिश्चित करने का दिल्ली से कोई संदेश न देकर यह संकेत भेज दिया था कि गडकरी नहीं चाहते हैं कि आडवाणी का उम्मीदवार जीते। अगर मुख्यमंत्री चाहते तो पार्टी का उम्मीदवार हार ही नहीं सकता था।

इससे पहले भी कर्नाटक में येदियुरप्पा को हटाने में देर करने, उत्तराखंड में ऐन चुनाव के मौके पर मुख्यमंत्री बदलने सरीखे तमाम ऐसे फैसले हैं, जिनसे वे खुश नहीं हैं। वे चाहते थे कि उत्तराखंड में बहुत पहले ही बदलाव कर दिया जाए। हाल के राज्यसभा चुनाव तक में उनकी कहीं नहीं चली। शायद यही वजह है कि हाल में हुई पार्टी पदाधिकारियों की उस बैठक में, जिसमें कि अध्यक्ष नितिन गडकरी का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला किया गया, उन्होंने हिस्सा नहीं लिया।

अनंत कुमार ने इसकी वजह तबीयत ठीक न होना बताया था। लेकिन अगले ही दिन आडवाणी दिवंगत नेता भैरों सिंह शेखावत की प्रतिमा के अनावरण के लिए राजस्थान पहुंच गए। यह अलग बात है कि इससे पहले वे कोर कमेटी की बैठक में सैद्धांतिक रूप से अध्यक्ष को एक और कार्यकाल दिए जाने पर अपनी सहमति जता चुके थे।

भाजपा नेताओं को डर है कि कहीं अगले हफ्ते मुंबई में होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वे अपने दिल का गुबार न निकाल दें। उन्हें यह भी डर सता रहा है कि कहीं वे बैठक का बहिष्कार ही न कर दें। आडवाणी ने अपने एक करीबी नेता से यह भी कहा कि कई बार तो मेरा मन करता है कि सब कुछ छोड़ कर गुड़गांव के अपने फ्लैट में चला जाऊं और वहां सुबह डबल रोटी में चीनी-मक्खन लगा कर चाय के साथ खाते हुए अखबार पढ़ते अपना समय बिताऊं।

उनकी इस निराशा को देख कर पार्टी छोड़ने के बाद उमा भारती के कहे गए वे शब्द एकदम सही साबित होते लगते हैं कि भाजपा में वाजपेयी व आडवाणी की हालत उन बूढ़ी बुआओं जैसी हो गई है, जिनके पैर तो सब छूते हैं पर उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं करता है।

"साभार जनसत्ता "


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