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भाजपा के भाई और दादा की इज्जत बचाई कांग्रेसी बाबा ने !




भोपाल  मप्र की भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री का सपना देखने वाले एक कद्दावर नेता को अपने कद का एहसास उस समय हुआ जब एक सौदे में गड़बड़ी होने पर दुसरे पक्ष के लोगों ने इन जनाब को इनके कद का एहसास ही नहीं कराया बल्कि इनके हनुमान कहे जाने वाले(सभी तरह की सौदेबाजी करने वाले)सख्श को ना केवल कान पकड़ कर माफी मांगनी पड़ी बल्कि अच्छा खासा हर्जाना देना पड़ा। प्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों यह मामला काफी चर्चाओं में है और बातों-बातों में सत्ता के गलियारों से होते हुए अफसरों के मोबाईल में एसएमएस से पहुंच रहा है। बात ही कुछ ऐसी है पहलियां ना बुझाते हुए हम आपकों पूरी कहानी सुनाते हैं।

मप्र की भाजपा सरकार में ये जनाव गुरू चेले के नाम से जाने जाते है। गुरू का कद प्रदेश की राजनीति में पर्वत से भी बड़ा है और चेला तो दादाओं का भी दादा है। कहानी की शुरूआत ऐसे हुई कि अपने आपको दादा (बड़े भाई को महाष्ट्रीयन परिवार दादा कहते हैं) समझने वाले इन महाशय ने एक मामले में चंबल एरिये के एक व्यवसायी से कुछ सौदा और बयाने के तौर पर अच्छी मोटी रकम ले ली। सौदे में लेटलतीफी होने पर जब पार्टी ने दादा को परेशान करना शुरू किया तो वे अपनी वाली पर उतर आए और कह दिया जो करते बने कर लो। दादा के इस जवाब को अगली पार्टी ने चैलेंज के रूप कबूल कर लिया लेकिन चेले के बड़े बोल का खामियाजा गुरू के बेटे को उठाना पड़ा। चंबल ऐरिये की इस पार्टी ने गुरू के बेटे को अपने स्टाईल मे दावत पर ले गए और डिमांड कर दी की गुरू के बेटे को लेने चेला आए।


मामला गुरू की प्रतिष्ठा से जुड़ चुका था तो चेला अपनी फौज पलटन के साथ पहुंच गया लेकिन उसे नहीं पता था कि यहां फिल्म शोले की तरह ही कोई सीन होने वाला है हुआ भी ऐसा ही जब चेले को उसके कद का एहसास कराते हुए सवाल रखा गया कि या तो गुरू का बेटा यहां से जाएगा या चेला यह सुनकर इन महाशय की जमीन खसक गई अपने एरिये के शेर समझने वाले दादा के गालो की मोटाई अपने आप पिचक गई और उन्हें एहसास हो गया कि भले ही वे अपने एरिये में शेर कहें जाते हो लेकिन उनकी स्थिति उस डरी हुई बिल्ली से भी बदतर थी जो शिकारी कुत्तों में फंस जाती है दादा को लंबे समय बाद अपनी ताकत का एहसास हुआ होगा और वो भूली बिसरी बातें भी याद आ गई होगी जब वे अपने गुरू के बैनर और पोस्टर लगाने सडक़ों पर निकलते थे तो कांग्रेसी उनकों भगाते फिरते थे।

अपनी आंखों के सामने अपना राजनैतिक जीवन मट्टी में मिलता देख दादा ने अपने गुरू से संपर्क किया। अब देखिए सत्ता की जुगलबंदी गुरू ने तुरंत अपने कांग्रेसी आका से संपर्क कर घटना क्रम से अवगत कराया। इन गुरू चेले के यह कांग्रेसी आका कोई और नहीं मप्र की राजनीति में अपने बड़ बोलेपन के लिए पहचाने जाने वाले बाबा..... है जिनके निशाने पर हमेशा भाजपा रहती है फिर क्या था आका ने तुरंत अपने पुराने पट्ठों को सक्रिय कर पता लगाया कि गुरू चेले के साथ यह हिमाकत किसने की है। समझौते का नाम ही राजनीति है और यहां भी वहीं हुआ आका ने गुरू चेले की इज्जत बचाने के लिए कुछ अर्थदंड तय करवा लिया जिसका इंतजाम चेले ने चुटकियां में कर दिया। कहानी यहीं नहीं खत्म होती चेला जब अर्थदंड देने को तैयार हुआ तो विरोधी पार्टी ने निशानी के तौर पर चेले की जमकर खातिर की अब यह खातिर कैसी रही होगी चेले के अलावा और कोई नहीं बता सकता।

सत्ता के गलियारों में चल रही इस खबर [ चर्चा पर आधारित ] की पुष्टि तो दूर अफवाह बताने वाला भी कोई नहीं है। प्रशासनिक महकमा, संगठन, सत्ता के जिम्मेदार लोग ऐसी किसी भी घटना के होने से इंकार कर रहे है। अब सवाल उठता है कि बिना आग लगे आखिर धुंआ कैसे उठा। घटना की सत्यता वहीं लोग जानते है जिन लोगों के नाम चर्चा में है ऐसे में उनकी मजबूरी है कि अगर वह सामने आकर खंडन करते है तो उनका यह खंडन इस चर्चा को खबरों की सुर्खियां बना देगा। बहरहाल पूरी कहानी का निचौड़ यही है की राजनीति में भले ही कोई कितना बड़ा हो जाए छोटी सी घटना उसे घुटनों के बल खड़ा करने पर मजबूर कर देती है।


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