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क्या यथार्थ में नरेन्द्र मोदी एक सफल प्रशासक हैं?





एल.एस.हरदेनिया हिटलर महान है। हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने अभूतपूर्व उन्नति की है। हिटलर के समान महान नेता जर्मनी के इतिहास में भी कभी नहीं हुआ। यह विश्वास जर्मनी के सभी नागरिकों के मन में बैठा दिया गया था। इसका श्रेय जोसेफ गोयवेल्स को जाता है। गोयवेल्स हिटलर के प्रमुख सहायक थे जिन्हें उनकी छवि बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। गोयवल्स का कहना था कि प्रेस एक ऐसा की-बोर्ड है जिसे सरकार जैसा चाहे वैसा उसे खेल सकता है। लगभग यही स्थिति गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की है। वे एक सक्षम मुख्यमंत्री है, उनके नेतृत्व में गुजरात ने अद्भुत प्रगति की है। गुजरात का प्रत्येक नागरिक संतुष्ट है। नरेन्द्र मोदी ने जो गुजरात को दिया है उसके पहले किसी ने यह गुजरात को वह सब नहीं दिया है। यह प्रचार बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। मोदी के प्रचारक यह बात बड़े जोरदार ढंग से कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री के पद के लिए वे सबसे ज्यादा सक्षम नेता है परंतु कुछ विशेषज्ञों का यह मानना है कि यह सब ऊपरी प्रचार है। धरातल पर वास्तविकता कुछ और है।

इस दरम्यान एक ऐसी घटना हुई जिसके कारण यह समझा जा रहा था कि राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने के लिए जो बाधायें थी उनमें से आखिरी बाधा दूर हो गयी है। पिछले 10 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जाँच दल ने यह सिफारिश की है कि गुलबर्ग सोसायटी का कत्लेआम का मामला बंद किया जाय। जाँच समिति ने माना है कि नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध कोई भी सबूत नहीं मिला है। इस रिपोर्ट के बाद नरेन्द्र मोदी के समर्थक और प्रशंसक यह मान रहे हैं कि अब नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर आने के रास्ते की अंतिम बाधा दूर हो गयी है। अब मोदी पूरे देश के लिए वह सब कुछ कर सकेंगे जो उन्होंने गुजरात के लिए किया है। पर आवश्यकता यह जानने की है कि आखिर मोदी ने गुजरात के लिए क्या किया है। जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति का नतीजा सामने आया ठीक उसी समय अमरीका में प्रकाशित होने वाली टाइम पत्रिका के एशियायी संस्करण ने फ्रंट पेज स्टोरी में मोदी को भारत का "विकास पुरूष" बताया है। वैसे यह अजीब बात है कि जहां एक तरफ अमरीका नरेन्द्र मोदी को वीजा नहीं दे रहा है वहीं एक अमरीकी पत्रिका उन्हें विकास पुरूष बता रही है। न सिर्फ अमरीकी पत्रिका परंतु हमारे देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा मोदी की प्रशंसा करते नहीं थकता। यह कहा जा रहा है कि मोदी के नेतृत्व में गुजरात में बहुत बड़े पैमाने पर उद्योगो में पूँजी निवेश हुआ है।

बंगलौर से प्रकाशित दैनिक डेकन हेराल्ड ने यह पता लगाने का प्रयास किया है कि वास्तविकता क्या है? जिस तरह 2005 में जिन्ना की तारीफ कर लालकृष्ण आडवानी ने यह बताने का प्रयास किया था कि वे वास्तव में सेक्यूलर राजनीतिज्ञ है जबकि उनकी वास्तविक छवि एक ऐसे नेता की है जिसने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। इसी तरह मोदी यह धारणा बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं कि वे ऐसे मुख्य मंत्री नहीं है जिसने 2002 के कत्लेआम की योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन किया था। वास्तव में वे ऐसे मुख्यमंत्री है जिनके नेतृत्व में गुजरात ने विकास की नई ऊंचाईयां छुई हैं परंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में गुजरात ने विकास की नई ऊंचाईयां छुई हैं? क्या गुजरात विकास की दौड़ में सबसे आगे है? क्या इस दौड़ में वह महाराष्ट्र, तमिलनाडू, और हरियाणा से आगे है? क्या मोदी के नेतृत्व में गुजरात ने ऐसा कुछ हासिल किया है जो अन्य किसी राज्य ने नहीं किया है?

वास्तविकता यह है कि विकास के जो मान्य सामाजिक आर्थिक मानदंड है उनमें से एक में भी गुजरात अन्य विकसित राज्यों में आगे नहीं है। ये मानदंड है, शिशु मृत्युदर, जीने की अपेक्षित आयु, पोषण, साक्षरता और पूँजी निवेश। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब सन् 2001 में मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री का नेतृत्व सम्हाला था उस समय भी गुजरात अन्य राज्यों की तुलना में विकसित राज्य था। उस समय प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से देश में गुजरात का स्थान चौथा था। इस दृष्टि से आज हरियाणा प्रथम स्थान पर है जबकि गुजरात चौथे स्थान से हट कर छटवे स्थान पर आ गया है। पिछले वर्ष नेशनल काउंसिल आफ एप्लाईड रिसर्च इस नतीजे पर पहुंचा था कि भुखमरी और कुपोषण की दृष्टि से गुजरात उत्तरप्रदेश से भी पीछे है। सर्वे के अनुसार गुजरात के 44.6 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है और शून्य से 5 वर्ष की आयु के 66 प्रतिशत बच्चे भयंकर रूप से कुपोषित है। गुजरात में उत्तरप्रदेश की अपेक्षा रात को भूखे सोने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा है। आम आदमी कितने वर्ष जीता है यह किसी भी समाज की प्रगति का प्रमुख मानदंड होता है। एक साधारण भारतीय की अपेक्षित आयु 66 वर्ष है। परंतु एक गुजराती की अपेक्षित आयु अखिल भारतीय आंकड़े से दो वर्ष कम है। एक गुजराती केरल के निवासी की तुलना में 10 वर्ष पहले मृत्यु का आलिंगन कर लेता है। केरल के अतिरिक्त महाराष्ट्र पंजाब और तमिलनाडू के निवासी गुजरात की तुलना में ज्यादा जीते है।

जहां तक शिशु मृत्युदर का सवाल है गुजरात में यह महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक से ज्यादा है। इसी तरह मातृ-मृत्यु दर के मामले में भी गुजरात काफी पिछड़ा है। साक्षरता के मामले में गुजरात 16वें स्थान से 18वें स्थान पर आ गया है। यह गिरावट नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री होने के दौरान आई है। यह बड़े जोरदार ढंग से प्रचारित किया जा रहा है कि गुजरात में अरबों डालर का पूँजी निवेश हुआ है। इस भारी भरकम निवेश के कारण गुजरात में भारी संख्या में रोजगार के अवसर निर्मित हुये है। इससे गुजरात ने गरीबी और भुखमरी से पूरी तरह से मुक्ति पा ली है।

जहां तक गुजरात में विदेशी पूँजी निवेश का सवाल है यह दावा किया जा रहा है कि मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में 876 बिलियन डालर का निवेश हुआ है। यदि यह आंकड़ा सही है तो इसी दरम्यान चीन में जो पूँजी निवेश हुआ है जो 600 बिलियन डालर है जो गुजरात से कम है। क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि गुजरात में चीन से ज्यादा पूँजी निवेश हुआ है। इस दावे को रिजर्व बैंक ने झूठा साबित कर दिया है। रिजर्व बैंक के अनुसार इस दरम्यान में मात्र 7.3 बिलियन डालर का पूँजी निवेश हुआ है। इस दरम्यान में गुजरात में हुआ निवेश देश में हुये निवेश का 5 प्रतिशत है। जबकि इसी अवधि में तमिलनाडू और कर्नाटक में हुआ पूँजी निवेश देश में हुए पूँजी निवेश का 6 प्रतिशत है जबकि इसी पीरियड में महाराष्ट्र में हुआ निवेश 35 प्रतिशत है। इससे यह साबित होता है कि कैसे गुजरात के गोयवल्स मोदी के बारे में प्रचारित कर रहे हैं और झूठ को सच बता रहे हैं परंतु यह धोखा ज्यादा दिन नहीं चलेगा क्योंकि संपूर्ण राष्ट्र को मूर्ख समझना किसी तरह समझदारी का प्रतीक नहीं है।(हम समवेत)


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