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कांग्रेस का आरोप, ३२ फीसदी राशि खर्च नहीं और हजारों बच्चों ने बीच में ही छोड़ा स्कूल ,स्कूल शिक्षा को छह रूपए भी नहीं दिए जाने चाहिए








भोपाल। कांग्रेस विधायक डॉ गोविंद सिंह ने  विधानसभा में आरोप लगाया कि मप्र में स्कूल शिक्षा का बुरा हाल है। केन्द्र से मिल रही मदद को राज्य सरकार खर्च नहीं कर पा रही और बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार का बोलबाला है। विभाग ६ हजार करोड़ रूपए की मांग कर रहा है पर मेरे हिसाब से उसे छह रूपए भी नहीं दिए जाने चाहिए।

स्कूल शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा की शुरूआत करते हुए डॉ सिंह ने कहा कि राज्य सरकार स्कूल शिक्षा का ३२ फीसदी बजट खर्च ही नहीं कर पाई। स्कूलों का दर्जा प्राथमिक से मिडिल, मिडिल से हाई स्कूल और हाई स्कूल से हायर सेकंडरी करने में मापदंडों का पालन नहीं किया जा रहा। उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष २०१०-११ में कक्षा ९ से १२ वीं के बीच के २६ फीसदी विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ी। भोपाल में कक्षा एक से ११ वीं तक शाला त्यागने वाले बच्चों की संख्या २२ हजार है। हालात ये हैं कि ५५ हजार बच्चों को साइकिलें अब तक नहीं मिलीं। यूनीफॉर्म के पैसे नहीं मिल रहे, क्योंकि बैंक शून्य रकम पर खाते नहीं खोल रहे। ऐसे में सरकार को तहसीलदार के समक्ष नकद राशि देने की व्यवस्था करना चाहिए।

उन्होंने छात्र बीमा योजना का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं कि योजना में मुआवजा नहीं दिया गया। डॉ. सिंह ने कहा कि अध्यापकों की नियुक्ति में शहरी के बजाए गांव के नौजवानों को प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि शहर के आवेदक अंक प्रतिशत ज्यादा होने के चलते नौकरी तो पा जाते हैं लेकिन अध्यापन के लिए गांव नहीं जाते। वे हजार-दो हजार में गांव के ही नौजवान को नौकरी पर रख लेते हैं।

कांग्रेस विधायक ने गवर्नमेंट प्रेस में एक करोड़ की छपाई का बिल चार करोड़ रूपए बनाकर उसका भुगतान लेने के मामले की जांच कराने की मांग भी की। उन्होंने कहा, इस साल प्रदेश में एक हजार नए स्कूल भवन बनाने का ठेका भोपाल विकास प्राधिकरण को दिया गया है, जबकि प्राधिकरण भोपाल में ही अपना काम पूरा नहीं कर पा रहा। डॉ सिंह ने कहा कि स्कूलों में आरएसएस की संस्था विद्या भारती की पत्रिका देवपुत्र १५ साल तक भेजने का अनुबंध साढ़े १३ करोड़ रुपए में किया। ढुलाई सरकार ही करेगी। यह पत्रिका तीसरी चौथी कक्षा के बच्चे भी पढ़ और समझ नहीं पाते। प्रदेश में व्याख्याता के ढाई हजार पद खाली हैं। ये चिंता की बात है। स्कूलों में पढ़ाई कैसे होगी?


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