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दिग्गी राजा संघ को गाली देकर संघ और भाजपा को मजबूत कर रहे है

वैसे दिग्गविजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राहुल गांधी के नजदीकी है। लेकिन उनकी सारी गतिविधि मरते हुए संघ और भाजपा को जिंदा कर रही है। अब धीरे-धीरे यह बात भी सामने आने लगी है कि संघ और दिग्गी राजा के बीच एक सांठगांठ है। इस सांठगांठ के तहत सुनोयोजित तरीके से संघ को गाली देकर दिग्गी राजा मजबूत कर रहे है। बताया जाता है कि महत्वहीन होते संघ को जिस तरह से दिग्गी ने लाइम लाइट में लाया है, उससे कांग्रेस के कई नेता नाराज है। अब वे दिग्गी राजा को वीपी सिंह और अर्जुन सिंह के कैटेगरी में लाने लगे है, जिन्होंने समय-समय पर कांग्रेस को भारी नुकसान किया और इसकी भरपाई कांग्रेस को करनी पड़ी।

इस समय दिग्गी राजा राहुल गांधी के एडवाइजर है। कुछ इसी प्रकार से राजीव गांधी के नजदीक वीपी सिंह थे। अर्जुन सिंह भी राजीव गांधी के नजदीकी थे। लेकिन दोनों ने कांग्रेस को भारी नुकसान किया। बताया जाता है कि ये कांग्रेस की राजघरानों की राजनीति है, जो कांग्रेस को अंदर रहकर कांग्रेस को नुकसान करते है। ये भी सच्चाई है कि तीनों स्वर्गीय वीपी सिंह, अर्जुन सिंह और दिग्गी राजा रिश्तेदार है रियासतों से संबंधित है। दिग्गी राजा के लगातार हमलावर तेवर ने कांग्रेस के कई नेताओं को सतर्क कर दिया है। बताया जाता है कि दिग्विजय सिंह विरोधी कई कांग्रेसी इस बात का पता लगा रहे है कि संघ से दिग्गी का क्या सांठगांठ है।

वैसे संघ दिग्गी राजा पर मेहरबान रहा है। दिग्गी राजा के भाई लक्ष्मण सिंह को तो भाजपा से भी टिकट मिला था। दिग्गी राजा ने खुद स्वीकार किया है कि अपने जीवन के शुरूआती तीन साल उन्होनें संघ के साथ बिताया था, लेकिन बाद में संघ की नीतियों के कारण छोड़ दिया था। लेकिन दिलचस्प बात है कि संघ की नीतियों को जानते हुए भी दिग्गी राजा ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को संघ से जुड़ने की हरी झंडी दे दी थी। जबकि लक्ष्मण सिंह एक भी एक कदम दिग्गी राजा के बिना नहीं उठता है। राजनीति सक्रिय सारे लोग जानते है कि दिग्गी राजा के सीएम काल में भोपाल में लक्ष्मण सिंह की तूती बोलती थी।

वैसे भी मध्य प्रदेश और उतर प्रदेश की कई रियासतों के राजा बेशक कांग्रेस की राजनीति करते रहे। लेकिन अंदर से हिंदुवादी राजनीति को हवा देते रहे। मध्य प्रदेश के राजघराने तो इस मामले में माहिर रहे। ग्वालियर वाले माधव राव और उनके बेटे ज्योतिरादित्य कांग्रेस में थे तो आधे से ज्यादा रिश्तेदार भाजपा में है। बुआ वसुंधरा और दादी विजयाराजे कांग्रेस विरोध में भाजपा के साथ डटे रहे। इनकी सांठगांठ इतनी अच्छी थी कि एक दूसरे के खिलाफ कभी लड़े। एक गुना तो एक ग्वालियर की सीट पर कब्जा कर बैठे रहे। बुआ राजस्थान की राजनीति करती रही। देशी रिसायतों के खत्म होने के बाद सता का सुख लेने का ये नया तरीका था।

दिग्गी राजा भी रियासती राजनीति के देन है। उन्होंने खुद कांग्रेस की राजनीति की और जबतक सता रही तो भाई साथ थे। जैसे ही मध्य प्रदेश से निकले भाई को भाजपा में भेज दिया। पिछले दिनों भाई संघ के कुछ ब्यान से नाराज थे और भाजपा छोड़ गए। लेकिन बताया जाता है कि ये भी फिक्सिंग थी। क्योंकि कांग्रेस में दिग्गी राजा पर शक हो रहा था। इसलिए उन्होंने अपने भाई को भाजपा छोड़ने के लिए कह दिया। कांग्रेस में दिग्गी राजा पर यह सवाल इसलिए भी उठ रहे है कि यूपी का हर नेता इस बात से नाराज है कि दिग्गी के मुस्लिम समर्थक रूख के कारण यूपी में कांग्रेस की तरफ लौट रहे शहरी मध्यवर्ग और ब्राहमणों को वापस भाजपा की तरफ मोड़ दिया है। इससे शहरी इलाकों में भाजपा को फायदा हो रहा है। खुद इसे कांग्रेसी नेता स्वीकार कर रहे है।

बताया जा रहा है कि वास्तव में यूपी चुनाव में दिग्गी राजा अपने ब्यानों से भाजपा को मजबूत कर रहे है कांग्रेस में यह बात उठ रही है कि भाजपा को गाली देना तब वाजिब था जब यूपी में भाजपा सता में होती और मुख्य दौड़ की पार्टी होती। जब यूपी में भाजपा कहीं लड़ाई में ही नहीं है, फिर क्यों उसे गाली देकर मजबूती दी जा रही है। भाजपा यूपी में तीसरे चौथे नंबर की पार्टी है, लेकिन दिग्गी राजा के ब्यान के कारण भाजपा मजबूत हो रही है। वो मुख्य लड़ाई में शामिल होने की स्थिति में है और इसकी सारी जिम्मेवारी दिग्गी राजा की है। इन तथ्यों की पूरी चर्चा इस समय कांग्रेस में हो रही है।

 *संजीव पांडेय चंडीगढ़*


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