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.मृत्युदण्ड सजा नहीं, न्यायिक हत्या-थॉमस



नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के.टी. थॉमस के मुताबिक, मृत्युदंड सजा नहीं, न्यायिक हत्या है। थॉमस ने एक साक्षात्कार में कहा कि मृत्युदंड के खिलाफ दुनिया की राय बदल रही है और अधिक से अधिक देश अपने यहां मृत्युदंड समाप्त कर रहे हैं। भारत में भी यह बहस जारी है। लेकिन अंतत: यह एक राजनीतिक निर्णय है।
ये वही थॉमस हैं, जिनकी अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने पूर्व पीएम राजीव गांधी की हत्या के तीन आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। थॉमस, नलिनी के मृत्युदण्ड के खिलाफ थे, जबकि बाकी जज चारों के खिलाफ मृत्युदंड के पक्ष में थे। बाद में राष्ट्रपति के दया याचिका मंजूर करने के बाद नलिनी की सजा उम्रकैद में बदल दी गई।
...तो आपने क्यूं दी उन्हें मौतथॉमस मृत्युदंड के खिलाफ हैं तो उन्होंने राजीव के तीन हत्यारों-मुरूगन, सनथन, और पेरारिवलन को मृत्युदण्ड क्यों सुनाया? इसके जवाब में थॉमस ने कहा कि मैंने संविधान के अनुसार  कर्तव्य पालन की शपथ ली थी। मेरे व्यक्तिगत विचार चाहे जो भी हों, एक न्यायाधीश के रूप में मुझे मौजूदा कानूनों के अनुसार काम करना था। दण्ड के तीन उद्देश्य हैं- सुधार, निवारण और प्रतिकार। प्रतिकार (दांत के बदले दांत, आंख के बदले आंख) का नियम व्यापक तौर पर असभ्य माना जाता है।


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