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भोपाल नगर निगम का कड़वा सच झील संरक्षण के नाम पर सिर्फ धन की लूट जनता को पेयजल में मिलता है मलमूत्र

4 जनवरी 2009 से जनभागीदारी के तहत नगर निगम भोपाल क्षेत्र से लेकर पूरे प्रदेश भर में झीलों, ताल, कूओं के संरक्षण की मानों आँधी चल रही है। जिसमें निगम के आयुक्त मनीष सिह तथा प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान खूब जनता से श्रमदान करा कर यह संदेश दे रहे है कि हमें जनता के लिए पेयजल की व्यवस्क्था के लिए सचेव है और हम जन सेवक लेकिन अधिकांश जनता नहीं जानती कि यह उनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अन्तर है । जल संरक्षण के नाम पर विज्ञापनों में लाखों रूपये व्यय करने मीडिया को साधा जा रहा है । और श्रमदान करके जनता को गुमराह कर उसकी आस्था विश्वास के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। भोपाल नगर निगम की हकीकत यह है कि जो भी मिट्टी तालाब के अन्दर खुद रही है वह वहीं पड़ी है और वही कुछ लोगों क ो प्रति डम्पर एक हजार रूपये के हिसाब से 40-50 डम्पर मिट्टी प्रतिदिन विक्र य की जा रही है । विश्वस्त सूत्र बताते है झील संरक्षण के नाम पर हाउङ्क्षसग वोर्ड , राजधानी परियोजना, भोपाल विकास प्राधिकरण ,पर्यटन विकास निगम आदि से लिये गये लाखों रूपये निगम भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय के इर्द-गिर्द,लिंक नम्वर एक एवं दो के विकास डिवाइडर निर्माण तथा विकास के नाम पर खर्च किया है। जिसका खर्चा लाखों में नहीं वल्कि करोड़ो में है वहीं शुद्ध पेयजल के नाम से बड़े तालाब में शहरभर के दो दर्जन से अधिक गन्दे नालों का मलमूत्र वाला जल पिलाया जा रहा है । जैसा की आप जानते है कि 11 वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा निर्मित भोपाल ताल इस शहर की ना केवल पहचान है बल्कि भोपाल की जीवन रेखा है । लगभग 30 वर्षाे से तालाबों इर्द-गिर्द जो निर्माणों का सिलसिला आरम्भ हुआ निर्बाध गति से जारी है 1995-2004 तक जारी तालाब संरक्षण की भोजवेट लेन्ड परियोजना से भी तालाबों का कोई भला नहीं हुआ, आज भी इन तालाबों में शहर के दर्जनों गन्दे नालो का जल समाहित हो रहा है । इतना ही नही बड़े छोटे व मोतिया तालाब के आसपास पचास हजार से अधिक आवासीय तथा व्यवसायिक भवनो का निर्माण हुआ है । बड़ी झील जिसका जल अभी भी 30 प्रतिशत से अधिक आबादी को प्रदाय होता है, चारो ओर से आबादी के दबाव में है इस बीच पिछले कुछ वर्षो में बोट क्लब, होटल, रेस्तरॉ, मेरिज गार्डन आदि आने सेे झील में जहां प्रदूषण भंयकर रूप से बड़ गया है वहीं इस की नैसङ्क्षगक सुन्दरता भी जा रही है । हाल ही में वी.आई.पी. रोड़ के बाद इस तालाब पर नगर निगम भोपाल द्वारा फ्लाई ओव्हर ब्रिज निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया है यह एैसा निर्णय है , जिससे तालाब की सुन्दरता में स्थाई ग्रहण लग जाएगा । यह कम शर्म एवं क्षोभ का विषय नही है कि जिस निगम में इस प्रस्तव पर सर्वसम्मति बनी वहॉ कभी भी इसमें समाहित हो रहे 27 से अधिक नालों व ग्रीनबेल्ट के अतिक्रमण पर कार्यवाही तो दूर चर्चा तक नही हुई । भोपाल के ताल न केवल शहर की प्यास बुझाते है बल्कि शहर के प्राकृतिक सन्तुलन को बनाए रखने का कार्य करते है, इस पहाड़ी क्षेत्र में पर्याप्त भूजल बने रहने का श्रेय इन तालाबों और उनके निर्माताओं को जाता है । इसे आज के नीति निर्माताओ का अक्षम अपराध ही कहेगे जो अपनी इस महान विरासत को मिटाने पर आमादा है । जिसे भावी पीढिय़ा कभी माफ नही करेगी । 11 वीं शताब्दी में इसका निर्माण राजा भोज ने इस पहाड़ी शहर की प्यास बुझाने के उद्देश्य से करवाया था इस तालाब का जल संग्रहरण क्षेत्र 370 वर्ग किलोमीटर तथा भंडारण क्षेत्र 31 वर्ग किलोमीटर है। पहले मुस्लिम शासक दोस्त मोहम्मद खां से लेकर आखिरी शासक नवाब हमीदुल्ला खां तक सभी ने इस शहर का वजूद बनाए रखने के लिए तालाबों की न केवल महत्ता को समझा बल्कि कई तालाब एवं अनगिनत बावडिय़ो और कुॅओ व बाग बगीचों का निर्माण कराया । शाहजहां बेगम के कार्यकाल में सबसे अधिक जल संरक्षण पर कार्य हुआ । 1970 के बाद शिमला हिल्स जिसका पूर्व में नाम धरमपुरी तथा अब श्यामला हिल्स है से बेहतासा निर्माणों की शुरूआत हुई । यह तालाब का कैचमेन्ट क्षेत्र है । 1974-75 में बड़े तालाब के दूसरे कैचमेन्ट क्षेत्र अहमदाबाद पैलेस जो अब कोहेफिजा कहलाता है । तत्कालीन भोपाल विकास प्राधिकरण एवं नगर पालिका भोपाल के प्रशासक महेश नीलकंठ बुच ने भवन अनुमति देने की शुरूआत की । 1980 के दशक में दोनों तालाबों में नगर पालिका भोपाल द्वारा गन्दे नाले मोडऩे भवन अनुज्ञा देने का सिलसिला तेज हो गया । राज्यपाल श्री सत्य नारायण सिन्हा ने तालाब जल को स्टूल वाटर कहा तथा वह अपने सेवन के लिए नर्मदा जल मंगवाने लगे । सरला ग्रेवाल राज्यपाल मध्य प्रदेश ने भी कुछ समय सरोवर हमारी धरोहर के नाम से तालाबों को लोकर सफाई मुहिम चलाई । 1990-91 में श्री बाबूलाल गौर जो उस समय भी स्थानीय शासन मंत्री थे पहली बार तालाब के समीप की बसाहट के हटाने का कार्य आरम्भ किया लेकिन बुलडोजर केवल स्लम पर चल कर रूक गया, और उनकी सरकार चली गई । 1994 -95 में वेटलेन्ड संरक्षण के नाम पर भोपाल झील के लिए जापान बैक ऑफ इन्टरनेशनल कोलेशन के तहत 247 करोड़ रू. भारत सरकार के माध्यम से म प्र सरकार को प्राप्त हुए । 1995-2004 तक जारी भोज वेटलेन्ड परियोजना के तहत 247 करोड़ की राशि भोपाल की बड़ी एवं छोटी झील पर व्यय करने का दावा किया गया । वी.आई.पी. रोड निर्माण जो गन्दे नालों सर्वप्रथम रोकने के कार्य के विपरीत 1995 में ही आरम्भ हुआ 28 करोड़ से अधिक राशि इस 4.5 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर व्यय की गई । 27 नाले झील से मोडऩे के सीवरेज लाईन एवं ट्रीटमेंट प्लाट का डी.पी.आर योजना का मूल कार्यकाल के अन्तिम वर्ष 2000 में बना । इस पर 60 करोड़ से अधिक की राशि व्यय का दावा किया गया है किन्तु आज 2009 तक यह पूर्ण फन्सनल नहीं है । झील से गाद निकालने के नाम पर 25 करोड़ रू. 2000 से 2002 तक व्यय कर 25 लाख क्यूबिक मीटर अर्थात 9 लाख ट्रक मिट्टी निकालने का परियोजना के अधिकारियों का क्लेम है ।ेलाताब संरक्षण के मूलकार्य से हट कर भदभदा ब्रिज पर 8 करोड़ बोट क्लब पाथवे पर 4 करोड़ जल गुणवता सुधार के नाम पर 10 करोड़ कमला पार्क के नीचे दीवार सुधार एवं पाथवे पर 3 करोड़ वृक्षारोपण पर 15 करोड़ छोटी झील के पास से धोबीघाट हटाने पर 8 करोड़ अधिकारियो के अध्ययन टूर पर 3 करोड़ , छोटी झील की चहार दीवारी पर 1 करोड़ गाद निकालने पर 2 करोड़ व्यय का दावा है । 11 वीं शताब्दी में इसका निर्माण राजा भोज ने इस पहाड़ी शहर की प्यास बुझाने के उद्देश्य से करवाया था इस तालाब का जल संग्रहरण क्षेत्र 370 वर्ग किलोमीटर तथा भंडारण क्षेत्र 31 वर्ग किलोमीटर है। पहले मुस्लिम शासक दोस्त मोहम्मद खां से लेकर आखिरी शासक नवाब हमीदुल्ला खां तक सभी ने इस शहर का वजूद बनाए रखने के लिए तालाबों की न केवल महत्ता को समझा बल्कि कई तालाब एवं अनगिनत बावडिय़ो और कुॅओ व बाग बगीचों का निर्माण कराया । शाहजहां बेगम के कार्यकाल में सबसे अधिक जल संरक्षण पर कार्य हुआ । 1970 के बाद शिमला हिल्स जिसका पूर्व में नाम धरमपुरी तथा अब श्यामला हिल्स है से बेहतासा निर्माणों की शुरूआत हुई । यह तालाब का कैचमेन्ट क्षेत्र है । 1974-75 में बड़े तालाब के दूसरे कैचमेन्ट क्षेत्र अहमदाबाद पैलेस जो अब कोहेफिजा कहलाता है । तत्कालीन भोपाल विकास प्राधिकरण एवं नगर पालिका भोपाल के प्रशासक महेश नीलकंठ बुच ने भवन अनुमति देने की शुरूआत की । 1980 के दशक में दोनों तालाबों में नगर पालिका भोपाल द्वारा गन्दे नाले मोडऩे भवन अनुज्ञा देने का सिलसिला तेज हो गया । राज्यपाल श्री सत्य नारायण सिन्हा ने तालाब जल को स्टूल वाटर कहा तथा वह अपने सेवन के लिए नर्मदा जल मंगवाने लगे । सरला ग्रेवाल राज्यपाल मध्य प्रदेश ने भी कुछ समय सरोवर हमारी धरोहर के नाम से तालाबों को लोकर सफाई मुहिम चलाई । 1990-91 में श्री बाबूलाल गौर जो उस समय भी स्थानीय शासन मंत्री थे पहली बार तालाब के समीप की बसाहट के हटाने का कार्य आरम्भ किया लेकिन बुलडोजर केवल स्लम पर चल कर रूक गया, और उनकी सरकार चली गई । 1994 -95 में वेटलेन्ड संरक्षण के नाम पर भोपाल झील के लिए जापान बैक ऑफ इन्टरनेशनल कोलेशन के तहत 247 करोड़ रू. भारत सरकार के माध्यम से म प्र सरकार को प्राप्त हुए । 1995-2004 तक जारी भोज वेटलेन्ड परियोजना के तहत 247 करोड़ की राशि भोपाल की बड़ी एवं छोटी झील पर व्यय करने का दावा किया गया । वी.आई.पी. रोड निर्माण जो गन्दे नालों सर्वप्रथम रोकने के कार्य के विपरीत 1995 में ही आरम्भ हुआ 28 करोड़ से अधिक राशि इस 4.5 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर व्यय की गई । 27 नाले झील से मोडऩे के सीवरेज लाईन एवं ट्रीटमेंट प्लाट का डी.पी.आर योजना का मूल कार्यकाल के अन्तिम वर्ष 2000 में बना । इस पर 60 करोड़ से अधिक की राशि व्यय का दावा किया गया है किन्तु आज 2009 तक यह पूर्ण फन्सनल नहीं है । झील से गाद निकालने के नाम पर 25 करोड़ रू. 2000 से 2002 तक व्यय कर 25 लाख क्यूबिक मीटर अर्थात 9 लाख ट्रक मिट्टी निकालने का परियोजना के अधिकारियों का क्लेम है ।ेलाताब संरक्षण के मूलकार्य से हट कर भदभदा ब्रिज पर 8 करोड़ बोट क्लब पाथवे पर 4 करोड़ जल गुणवता सुधार के नाम पर 10 करोड़ कमला पार्क के नीचे दीवार सुधार एवं पाथवे पर 3 करोड़ वृक्षारोपण पर 15 करोड़ छोटी झील के पास से धोबीघाट हटाने पर 8 करोड़ अधिकारियो के अध्ययन टूर पर 3 करोड़ , छोटी झील की चहार दीवारी पर 1 करोड़ गाद निकालने पर 2 करोड़ व्यय का दावा है । बड़ा तालब का इतिहास - 11 वीं शताब्दी में इसका निर्माण राजा भोज ने इस पहाड़ी शहर की प्यास बुझाने के उद्देश्य से करवाया था इस तालाब का जल संग्रहरण क्षेत्र 370 वर्ग किलोमीटर तथा भंडारण क्षेत्र 31 वर्ग किलोमीटर है। पहले मुस्लिम शासक दोस्त मोहम्मद खां से लेकर आखिरी शासक नवाब हमीदुल्ला खां तक सभी ने इस शहर का वजूद बनाए रखने के लिए तालाबों की न केवल महत्ता को समझा बल्कि कई तालाब एवं अनगिनत बावडिय़ो और कुॅओ व बाग बगीचों का निर्माण कराया । शाहजहां बेगम के कार्यकाल में सबसे अधिक जल संरक्षण पर कार्य हुआ । 1970 के बाद शिमला हिल्स जिसका पूर्व में नाम धरमपुरी तथा अब श्यामला हिल्स है से बेहतासा निर्माणों की शुरूआत हुई । यह तालाब का कैचमेन्ट क्षेत्र है । 1974-75 में बड़े तालाब के दूसरे कैचमेन्ट क्षेत्र अहमदाबाद पैलेस जो अब कोहेफिजा कहलाता है । तत्कालीन भोपाल विकास प्राधिकरण एवं नगर पालिका भोपाल के प्रशासक महेश नीलकंठ बुच ने भवन अनुमति देने की शुरूआत की । 1980 के दशक में दोनों तालाबों में नगर पालिका भोपाल द्वारा गन्दे नाले मोडऩे भवन अनुज्ञा देने का सिलसिला तेज हो गया । राज्यपाल श्री सत्य नारायण सिन्हा ने तालाब जल को स्टूल वाटर कहा तथा वह अपने सेवन के लिए नर्मदा जल मंगवाने लगे । सरला ग्रेवाल राज्यपाल मध्य प्रदेश ने भी कुछ समय सरोवर हमारी धरोहर के नाम से तालाबों को लोकर सफाई मुहिम चलाई । 1990-91 में श्री बाबूलाल गौर जो उस समय भी स्थानीय शासन मंत्री थे पहली बार तालाब के समीप की बसाहट के हटाने का कार्य आरम्भ किया लेकिन बुलडोजर केवल स्लम पर चल कर रूक गया, और उनकी सरकार चली गई । 1994 -95 में वेटलेन्ड संरक्षण के नाम पर भोपाल झील के लिए जापान बैक ऑफ इन्टरनेशनल कोलेशन के तहत 247 करोड़ रू. भारत सरकार के माध्यम से म प्र सरकार को प्राप्त हुए । 1995-2004 तक जारी भोज वेटलेन्ड परियोजना के तहत 247 करोड़ की राशि भोपाल की बड़ी एवं छोटी झील पर व्यय करने का दावा किया गया । वी.आई.पी. रोड निर्माण जो गन्दे नालों सर्वप्रथम रोकने के कार्य के विपरीत 1995 में ही आरम्भ हुआ 28 करोड़ से अधिक राशि इस 4.5 किलोमीटर लम्बे मार्ग पर व्यय की गई । 27 नाले झील से मोडऩे के सीवरेज लाईन एवं ट्रीटमेंट प्लाट का डी.पी.आर योजना का मूल कार्यकाल के अन्तिम वर्ष 2000 में बना । इस पर 60 करोड़ से अधिक की राशि व्यय का दावा किया गया है किन्तु आज 2009 तक यह पूर्ण फन्सनल नहीं है । झील से गाद निकालने के नाम पर 25 करोड़ रू. 2000 से 2002 तक व्यय कर 25 लाख क्यूबिक मीटर अर्थात 9 लाख ट्रक मिट्टी निकालने का परियोजना के अधिकारियों का क्लेम है ।ेलाताब संरक्षण के मूलकार्य से हट कर भदभदा ब्रिज पर 8 करोड़ बोट क्लब पाथवे पर 4 करोड़ जल गुणवता सुधार के नाम पर 10 करोड़ कमला पार्क के नीचे दीवार सुधार एवं पाथवे पर 3 करोड़ वृक्षारोपण पर 15 करोड़ छोटी झील के पास से धोबीघाट हटाने पर 8 करोड़ अधिकारियो के अध्ययन टूर पर 3 करोड़ , छोटी झील की चहार दीवारी पर 1 करोड़ गाद निकालने पर 2 करोड़ व्यय का दावा है ।


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